छत्तीसगढ़ की महिला जनप्रतिनिधियों के अधिकारों पर बड़ा फैसला

अब पति, रिश्तेदार या करीबी नहीं चला सकेंगे ‘प्रतिनिधि राज’, शासन ने नियमों में किया स्पष्ट संशोधन
निर्वाचित महिला पार्षदों की जगह बैठकों और कामकाज में दखल देने वाले परिजनों पर लगेगी रोक; नगरीय प्रशासन विभाग की अधिसूचना राजपत्र में प्रकाशित
रायपुर। छत्तीसगढ़ के नगरीय निकायों में निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों के नाम पर उनके पति, रिश्तेदार अथवा अन्य करीबियों द्वारा कथित रूप से प्रतिनिधि बनकर हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति पर राज्य शासन ने नियमों में महत्वपूर्ण संशोधन कर स्पष्ट संदेश दिया है। अब निर्वाचित महिला प्रतिनिधि के पारिवारिक सदस्य को उनके प्रतिनिधि अथवा समन्वयक के रूप में नामित या नियुक्त नहीं किया जाएगा।
नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने 6 अगस्त 2026 को इसकी अधिसूचना जारी की, जिसे 7 अगस्त 2026 के छत्तीसगढ़ राजपत्र (असाधारण), क्रमांक 439 में प्रकाशित किया गया है।
‘पति-पार्षद’ और ‘परिजन Marksheet’ व्यवस्था पर सीधा प्रहार
राजपत्र में प्रकाशित संशोधन के अनुसार नियम 3 के बाद नया नियम 4 जोड़ा गया है। इसमें स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि—
निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के पारिवारिक सदस्यों को प्रतिनिधि के रूप में नामित/नियुक्त नहीं किया जाएगा।
इतना ही नहीं, नियम में निकट पारिवारिक सदस्य या नातेदार को भी प्रतिनिधि अथवा समन्वयक व्यक्ति के रूप में नामित अथवा नियुक्त नहीं करने की व्यवस्था की गई है।
इस संशोधन का व्यावहारिक संदेश बेहद महत्वपूर्ण है—
जनता ने जिस महिला को चुनकर सदन में भेजा है, संवैधानिक और वैधानिक जिम्मेदारी उसी निर्वाचित प्रतिनिधि की है; उसके पति या परिवार के किसी दूसरे सदस्य की नहीं।
नगर निगम से नगर पंचायत तक पड़ेगा असर
यह अधिसूचना छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम, 1956 तथा छत्तीसगढ़ नगरपालिक निगम अधिनियम, 1956 से संबंधित नियमों में संशोधन करती है। अधिसूचना में राज्य सरकार द्वारा बनाए गए “छत्तीसगढ़ नगरपालिका (लोकसभा सदस्य या राज्य विधानसभा के सदस्य या राज्यसभा के सदस्य द्वारा प्रतिनिधि के रूप में नाम निर्देशन हेतु अर्हताएं) नियम, 2022” का उल्लेख है।
ऐसे में नगरीय निकायों के प्रशासनिक कामकाज में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के परिजनों की औपचारिक प्रतिनिधि/समन्वयक के रूप में भूमिका पर अब नियमों की स्पष्ट दीवार खड़ी कर दी गई है।
अब बड़ा सवाल—जमीनी स्तर पर कितना सख्त होगा पालन?
छत्तीसगढ़ के स्थानीय निकायों में लंबे समय से राजनीतिक तौर पर “पार्षद पति”, “अध्यक्ष पति” या निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि के परिजन द्वारा कामकाज संभालने जैसी शिकायतें और चर्चाएं सामने आती रही हैं। नई अधिसूचना के बाद प्रशासन के सामने असली परीक्षा इसके प्रभावी क्रियान्वयन की होगी।
यदि किसी निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि के स्थान पर उसका पति, निकट संबंधी अथवा नातेदार स्वयं को प्रतिनिधि या समन्वयक बताकर प्रशासनिक व्यवस्था में औपचारिक भूमिका लेने का प्रयास करता है, तो संबंधित निकाय और अधिकारियों को अब इस संशोधित नियम को ध्यान में रखकर निर्णय करना होगा।
सबसे बड़ा संदेश—‘सीट महिला की तो अधिकार भी महिला का’
यह संशोधन केवल तकनीकी नियम परिवर्तन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका मूल उद्देश्य महिला जनप्रतिनिधित्व की वास्तविकता और स्वतंत्रता को मजबूत करना माना जा सकता है।
चुनाव महिला ने जीता है तो जनप्रतिनिधि की भूमिका भी वही निभाए—परिवार का कोई पुरुष सदस्य सत्ता का समानांतर केंद्र न बने।
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि क्या नगरीय प्रशासन विभाग प्रदेश के नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में इस व्यवस्था का कड़ाई से अनुपालन भी सुनिश्चित कराएगा?
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