बालको की बसों का ‘कॉलोनी राज’! एक मौत के बाद भी नहीं चेता सिस्टम?

रिहायशी इलाके में सुबह 6 से रात 10 बजे तक भारी बसों की धमाचौकड़ी का आरोप—पार्षद अब्दुल रहमान ने कलेक्टर, SP और निगम आयुक्त से मांगी तत्काल कार्रवाई
12 से 14 बसों की आवाजाही, बच्चों का खेल मैदान भी बना कथित पार्किंग स्थल; सवाल—क्या दूसरी दुर्घटना का इंतजार कर रहा प्रशासन?
विशेष रिपोर्ट | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क
कोरबा। बालको क्षेत्र के पं. रविशंकर शुक्ल नगर, वार्ड क्रमांक 26 में भारी बसों की आवाजाही को लेकर मामला अब केवल मोहल्ले की परेशानी तक सीमित नहीं रहा। एक बुजुर्ग की कथित बस दुर्घटना में मौत, वार्डवासियों का विरोध और कंपनी प्रबंधन को शिकायत किए जाने के बावजूद स्थिति नहीं बदलने का आरोप सामने आने के बाद प्रशासन की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
वार्ड पार्षद अब्दुल रहमान ने 10 अगस्त को कलेक्टर कोरबा, पुलिस अधीक्षक और नगर निगम आयुक्त को लिखित शिकायत सौंपकर आवासीय क्षेत्र से कंपनी कर्मचारियों को लाने-ले जाने वाली भारी बसों का संचालन तत्काल बंद कराने की मांग की है।
सबसे गंभीर बात यह है कि शिकायत कोई सामान्य ट्रैफिक समस्या नहीं बताती।
पत्र में स्पष्ट आरोप है कि कुछ दिन पूर्व बस की ठोकर से बुजुर्ग भोखलू साहू की मृत्यु हो चुकी है। घटना के बाद मृतक के परिवार और वार्डवासियों द्वारा शव रखकर प्रदर्शन किए जाने तथा भारी बसों की आवाजाही रोकने की मांग किए जाने का भी उल्लेख है।
एक जान चली गई… फिर भी वही रास्ता, वही बसें?
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है।
यदि किसी आवासीय इलाके में भारी वाहन की चपेट में आने से किसी व्यक्ति की मृत्यु होने की शिकायत प्रशासन के सामने पहुंच चुकी है, तो क्या उस मार्ग का यातायात सुरक्षा परीक्षण नहीं होना चाहिए?
क्या यह नहीं देखा जाना चाहिए कि जिस सड़क पर बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग पैदल चलते हैं, वहां दिनभर इतनी बड़ी संख्या में बसों का संचालन सुरक्षित है भी या नहीं?
और यदि दुर्घटना के बाद भी व्यवस्था जस की तस है तो अगली अनहोनी की जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?
सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक 12–14 बसें!
पार्षद की शिकायत के अनुसार विभिन्न कंपनियों के कर्मचारियों के परिवहन में लगी करीब 12 से 14 बसों का संचालन इसी आवासीय क्षेत्र से किया जा रहा है।
बसों की आवाजाही कथित तौर पर सुबह 6 बजे शुरू होकर रात 10 बजे तक चलती है। पत्र में दावा किया गया है कि इससे मुख्य मार्ग पर जाम की स्थिति पैदा होती है और बच्चों, महिलाओं तथा बुजुर्गों का पैदल निकलना तक मुश्किल होता है। लेकिन आरोप यहीं खत्म नहीं होते।
बच्चों का खेल मैदान या बस डिपो?
शिकायत में बेहद गंभीर दावा किया गया है कि बच्चों के खेल मैदान में भी 10 से 12 बसें खड़ी कर दी जाती हैं।
इसके अतिरिक्त सड़क किनारे और उद्यानों के आसपास भी बसें खड़ी किए जाने की बात कही गई है।
यदि यह स्थिति मौके पर सही पाई जाती है तो सवाल उठना स्वाभाविक है—
आवासीय कॉलोनी के बच्चों का खेल मैदान आखिर किसके लिए है—बच्चों के लिए या भारी बसों की पार्किंग के लिए?
शिकायत – कंपनी HR को बताया, फिर भी नहीं हुआ समाधान
पार्षद ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि संबंधित कंपनी के एचआर को बसें वार्ड के बाहर खड़ी करने और कर्मचारियों को वहीं से लाने-ले जाने के लिए अवगत कराया गया था, लेकिन आरोप है कि इसके बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
यदि यह दावा सही है तो प्रशासन को यह भी जांचना चाहिए कि संबंधित कंपनी/बस ऑपरेटर को समस्या की जानकारी कब दी गई और उसके बाद क्या कार्रवाई की गई?
अब पार्षद ने सीधे तीन बड़े अधिकारियों के दरवाजे पर पहुंचाया मामला
मामले को लेकर अलग-अलग शिकायतें कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और नगर निगम आयुक्त को सौंपी गई हैं।
कलेक्टर जनदर्शन में प्रस्तुत आवेदन की पावती पर जनदर्शन टोकन क्रमांक 2050126003178 और सुरक्षा क्रमांक 769 अंकित दिखाई देता है।
पार्षद की मांग भी स्पष्ट है—भारी बसों को रिहायशी कॉलोनी के अंदर चलाने के बजाय ट्रांसपोर्ट नगर बस स्टैंड, मुख्य बस स्टैंड अथवा घंटाघर के मुख्य मार्ग से संचालित कराया जाए।
अब कार्रवाई नहीं हुई तो जवाब किसके पास होगा?
मामला अब दस्तावेज के साथ प्रशासन की चौखट तक पहुंच चुका है।
एक कथित दुर्घटना में बुजुर्ग की जान जाने का आरोप है।
वार्डवासी विरोध कर चुके हैं।
पार्षद लिखित शिकायत दे चुके हैं।
कंपनी प्रबंधन को भी समस्या से अवगत कराने का दावा है।
ऐसे में अब यदि प्रशासन मौके का निरीक्षण और यातायात व्यवस्था की समीक्षा नहीं करता, तो सवाल और तीखे होंगे।
क्या रिहायशी कॉलोनी से भारी बसों का संचालन नियमानुसार हो रहा है?
क्या खेल मैदान में बसों की पार्किंग की अनुमति है?
क्या दुर्घटना के बाद संबंधित बस, चालक, मार्ग और सुरक्षा व्यवस्था की जांच हुई?
क्या ट्रैफिक पुलिस ने इस क्षेत्र का जोखिम आकलन किया?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या एक मौत भी व्यवस्था जगाने के लिए पर्याप्त नहीं है?
प्रशासन को शिकायत के तथ्यों की तत्काल जांच कर सुरक्षित बस रूट, निर्धारित पार्किंग और भारी वाहनों के प्रवेश की स्पष्ट व्यवस्था तय करनी चाहिए। साथ ही संबंधित कंपनी और बस संचालकों का पक्ष लेकर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि बसों का संचालन किस अनुमति और व्यवस्था के तहत किया जा रहा है।
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