खनन प्रभावितों के हक़ पर किसकी नज़र?

DMFT पर उठे सवालों से हिला सिस्टम, केंद्र सरकार को दो-दो बार भेजना पड़ा पत्र, फिर बनी जांच समिति
कोरबा का करोड़ों का जनहित फंड आखिर किसके लिए खर्च हुआ—खनन प्रभावितों के लिए या फाइलों के लिए?
कोरबा/नई दिल्ली , ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्युज नेटवर्क.
खनन प्रभावित गरीब, आदिवासी और विस्थापित परिवारों के जीवन को बेहतर बनाने के उद्देश्य से बनाया गया जिला खनिज संस्थान न्यास (DMFT) आज गंभीर सवालों के घेरे में है।
उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेज़ बताते हैं कि कोरबा DMFT में कथित गलत आवंटन (Misallocation) और कुप्रबंधन (Mismanagement) की शिकायत पर भारत सरकार के खान मंत्रालय को हस्तक्षेप करना पड़ा। इतना ही नहीं, मंत्रालय ने 20 नवंबर 2024 को एक बार और 17 जुलाई 2025 को दूसरी बार छत्तीसगढ़ शासन को कार्रवाई के निर्देश भेजे। इसके बाद जनवरी 2026 में तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की गई।
जब केंद्र को दो बार लिखना पड़े, तो सवाल उठना स्वाभाविक है
यदि शिकायत सामान्य होती, तो क्या भारत सरकार दोबारा पत्र लिखती?
यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप था, तो क्या दोबारा कार्रवाई का निर्देश देना पड़ता?
यदि कोई गंभीर मुद्दा नहीं था, तो क्या तीन सदस्यीय जांच समिति गठित होती?
यही वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर अब जनता जानना चाहती है।
DMFT—जनता का अधिकार, किसी का विशेषाधिकार नहीं। DMFT का पैसा किसी अधिकारी, विभाग या संस्था की सुविधा के लिए नहीं बनाया गया। यह उस मजदूर का अधिकार है जो धूल में काम करता है। यह उस आदिवासी परिवार का अधिकार है जिसकी जमीन खनन से प्रभावित हुई। यह उस गांव का अधिकार है जहां आज भी पेयजल, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है।
यदि इस निधि के उपयोग पर सवाल उठते हैं, तो सवाल केवल पैसों पर नहीं, बल्कि खनन प्रभावित लोगों के अधिकारों पर उठते हैं।
जांच समिति बन गई… लेकिन रिपोर्ट कहां है?
जनवरी 2026 में बिलासपुर संभागायुक्त कार्यालय ने तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई।
कलेक्टर कोरबा से रिकॉर्ड मांगे गए। शिकायतकर्ता लक्ष्मी चौहान को दस्तावेज़ सहित बुलाया गया। समिति को 15 दिन में रिपोर्ट देने का निर्देश भी दिया गया।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है—
यदि हुई, तो सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
यदि रिपोर्ट में कोई अनियमितता नहीं मिली, तो जनता को बताया क्यों नहीं गया? यदि अनियमितता मिली, तो जिम्मेदार कौन है?
जनहित की राशि पर जनता का पहला अधिकार। कोरबा देश के सबसे बड़े खनन क्षेत्रों में शामिल है। हर वर्ष करोड़ों रुपये DMFT में आते हैं।
ऐसे में जनता यह जानना चाहती है—
कितनी राशि खनन प्रभावित गांवों तक पहुंची?
कितनी राशि स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च हुई?
कितनी राशि पेयजल और आजीविका पर लगी?
क्या प्रत्येक व्यय PMKKKY के अनुरूप था?
इन प्रश्नों के उत्तर सार्वजनिक होना लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा है।
अब जवाबदेही का समय
यह मामला किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि जनधन और जनविश्वास का है। राज्य सरकार, जिला प्रशासन और संबंधित विभागों को चाहिए कि:
जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करें,
Action Taken Report (ATR) जारी करें
प्रत्येक DMFT परियोजना का सामाजिक और वित्तीय ऑडिट जनता के सामने रखें, यदि कहीं नियमों का उल्लंघन पाया गया हो तो कानून के अनुसार कार्रवाई करें।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क की स्पष्ट मांग
✅ जांच समिति की अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
✅ PMKKKY के तहत हुए प्रत्येक व्यय का सामाजिक ऑडिट कराया जाए।
✅ सभी DMFT परियोजनाओं का पूरा विवरण सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराया जाए।
✅ यदि जांच में अनियमितता पाई गई हो तो जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
संपादकीय
DMFT कोई सरकारी खजाना नहीं, बल्कि खनन प्रभावित लोगों का अधिकार है।
यदि इस निधि का प्रत्येक रुपया सही हाथों तक पहुंचता है तो यह विकास की मिसाल बनेगा।
लेकिन यदि शिकायतों के बाद भी जांच रिपोर्टें फाइलों में दब जाएं, तो सवाल केवल प्रशासन पर नहीं, पूरी जवाबदेही व्यवस्था पर खड़े होते हैं।
जनता का पैसा, जनता के लिए और जनता के सामने—यही DMFT की मूल भावना है। उपलब्ध दस्तावेज़ बताते हैं कि शिकायत पर केंद्र सरकार ने दो बार कार्रवाई के लिए लिखा और बाद में जांच समिति गठित हुई; हालांकि उपलब्ध सामग्री में जांच का अंतिम निष्कर्ष या दोष सिद्ध होने का रिकॉर्ड नहीं है।।
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