सक्ति में बारिश ने खोली विकास की हकीकत: कंधों पर शव, घुटनों तक कीचड़… जिला मुख्यालय से महज 1 किमी दूर ऐसा हाल, सिस्टम के सारे दावे फेल


सक्ती। एक ओर सरकारें गांव-गांव तक सड़क, डिजिटल कनेक्टिविटी और बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने के दावे करती हैं, वहीं छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले से आई एक तस्वीर इन दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। जिला मुख्यालय से महज एक किलोमीटर दूर बसे सोंठी ग्राम पंचायत में बारिश के बाद हालात इतने बदतर हो गए कि ग्रामीणों को एक महिला का शव कंधों पर उठाकर घुटनों तक धंसे कीचड़ के बीच श्मशान घाट तक ले जाना पड़ा। अंतिम यात्रा का यह दृश्य न केवल व्यवस्था की नाकामी उजागर करता है, बल्कि ग्रामीण इलाकों की जमीनी हकीकत भी सामने लाता है।


एम्बुलेंस तो दूर, पैदल चलना भी बना चुनौती
सोंठी गांव की 60 वर्षीय कमलाबाई महंत का बीमारी के चलते निधन हो गया। शनिवार सुबह जब परिजन अंतिम संस्कार के लिए शव लेकर निकले तो गांव से श्मशान तक जाने वाला रास्ता बारिश के कारण दलदल में बदल चुका था। कच्ची सड़क पर इतना कीचड़ था कि वहां किसी वाहन का पहुंचना संभव नहीं था। मजबूरी में ग्रामीणों ने शव को अपने कंधों पर उठाया और फिसलन भरे रास्ते से करीब एक किलोमीटर तक पैदल चलकर श्मशान घाट पहुंचे।

बोराई नदी भी बनी परीक्षा
श्मशान घाट तक पहुंचने की राह सिर्फ कीचड़ तक सीमित नहीं थी। रास्ते में पानी से लबालब भरी बोराई नदी भी पार करनी पड़ी। बारिश के कारण नदी का जलस्तर बढ़ा हुआ था, जिससे अंतिम यात्रा में शामिल लोगों को अतिरिक्त जोखिम उठाना पड़ा। ग्रामीणों का कहना है कि हर बारिश में यही स्थिति बनती है, लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं निकाला गया।

वर्षों से सड़क की मांग, फाइलों से आगे नहीं बढ़ा प्रस्ताव
ग्रामीणों के मुताबिक रेलवे क्रॉसिंग से बोराई नदी तक लगभग एक किलोमीटर लंबी पक्की सड़क बनाने की मांग लंबे समय से की जा रही है। ग्राम पंचायत ने मनरेगा के तहत सड़क निर्माण का प्रस्ताव भी भेजा था, लेकिन आज तक उसे मंजूरी नहीं मिल सकी। नतीजा यह है कि हर मानसून में गांव का संपर्क प्रभावित हो जाता है और लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर अंतिम संस्कार तक के लिए भारी परेशानियां उठानी पड़ती हैं।
ग्रामीणों का फूटा गुस्सा
इस घटना के बाद गांव में प्रशासन के प्रति नाराजगी साफ दिखाई दे रही है। ग्रामीणों का कहना है कि जिला मुख्यालय के इतने करीब होने के बावजूद उन्हें बुनियादी सड़क सुविधा तक नसीब नहीं है। हल्की बारिश में भी रास्ता पूरी तरह कीचड़ में तब्दील हो जाता है। उनका कहना है कि वर्षों से मांग करने के बावजूद जिम्मेदार विभागों ने सिर्फ आश्वासन दिए, लेकिन जमीन पर कोई काम नहीं हुआ।

बरसात ने फिर उजागर की जमीनी सच्चाई
मानसून की पहली तेज बारिश ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि विकास के दावे आखिर गांवों तक कब पहुंचेंगे। जब जिला मुख्यालय से महज एक किलोमीटर दूर स्थित गांव में अंतिम यात्रा भी सम्मानजनक ढंग से नहीं निकल पा रही है, तो दूरदराज के इलाकों की स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। ग्रामीणों ने प्रशासन से तत्काल पक्की सड़क निर्माण की मांग करते हुए चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।

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