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4 वकीलों की होगी गिरफ्तारी, एक्सीडेंट केस में कोर्ट को किया गुमराह

 

बिलासपुर। मोटर दुर्घटना दावा प्रकरण में कथित तौर पर फर्जी शपथपत्र और दस्तावेजों के आधार पर मुआवजा दावा पेश करने के आरोप में चार अधिवक्ताओं की अग्रिम जमानत याचिका अदालत ने खारिज कर दी है। विशेष न्यायाधीश (एट्रोसिटी) की अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपियों को राहत देने से इनकार कर दिया। मामला थाना सिविल लाइन क्षेत्र का है। यहां विभिन्न धाराओं में केस दर्ज किया गया है।

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फर्जीवाड़ा के आरोप में पुलिस ने एफआईआर दर्ज किया है। गिरफ्तारी से बचने के लिए अधिवक्ता एनपी चंद्रवंशी (62), भगवती कश्यपपति-स्व. सुधीर कश्यप (50), शुभम चंद्रवंशी 32 हनुमानगढ़ी चौक, राजकिशोर नगर, सरकंडा और सूरज वस्त्रकार (29) गतौरा, मस्तूरी ने अग्रिम जमानत आवेदन पेश किया था। कोर्ट में मोटर दुर्घटना दावा प्रकरण में महिला प्रेमिका कुजूर को मृतक प्रभात कुजूर की पत्नी बताते हुए मुआवजा दावा पेश किया गया था।

 

 

हालांकि जांच के दौरान प्रेमिका कुजूर ने स्वयं अदालत में उपस्थित होकर स्पष्ट किया, वह मृतक की पत्नी नहीं बल्कि उसके भाई की पत्नी है। उसने यह भी बताया, उसने न तो कोई शपथपत्र दिया और न ही किसी अधिवक्ता को अधिकृत किया।

 

इसके अलावा एक अन्य महिला मिथिलता कुजूर ने भी बयान दिया है, उसने किसी प्रकार के दस्तावेज या वकालतनामा पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इस खुलासे के बाद संबंधित न्यायालय ने थाना सिविल लाइन को आरोपियों के खिलाफ अपराध दर्ज करने के निर्देश दिए।

 


और शपथपत्र के लिए किसी अन्य व्यक्ति को खड़ा कर उसकी पहचान कराई गई। अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया, आरोपी अधिवक्ता हैं और कानून के जानकार होने के बावजूद इस तरह का कृत्य किया गया है, जो गंभीर अपराध है।

 

 

वहीं बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपियों ने उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर कार्य किया है और वे निर्दोष हैं। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और प्रथम दृष्टया आरोपियों को अग्रिम जमानत देने योग्य नहीं पाया। अदालत ने चारों आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि मामले की गंभीरता और परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें राहत नहीं दी जा सकती।

 

 

साथ ही आदेश की प्रति थाना सिविल लाइन को भेजने के निर्देश दिए गए हैं। पुलिस ने इस मामले में एक साथ कई गंभीर धाराओं के तहत केस दर्ज किया है, जिसमें धारा 228 (कोर्ट का अपमान), 229 (झूठा प्रतिरूपण), 233 (झूठे साक्ष्य/दस्तावेज), 246 (फर्जी दस्तावेज का उपयोग), 318 (धोखाधड़ी से लाभ), 335-336 (लापरवाहीपूर्ण कृत्य), 338 (गंभीर हानि) और 340(2), 3(5) (न्यायिक प्रक्रिया से छेड़छाड़ व सामूहिक अपराध) शामिल हैं।

 

इनमें खास तौर पर धारा 233 और 246 में 7 साल तक, जबकि धारा 338 में 10 साल तक की सजा का प्रावधान है। यानी मामला सीधे गंभीर आपराधिक श्रेणी में आता है। अग्रिम जमानत खारिज होते ही पुलिस कभी भी आरोपियों को गिरफ्तार कर सकती है। गिरफ्तारी के बाद आरोपियों के पास रेगुलर बेल के लिए निचली अदालत या हाई कोर्ट में आवेदन करने का विकल्प होगा।

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