निगम के अधिकारियों का दोहरा चरित्र आया सामने, गरीबों पर सितम-अमीरों पर रहम, निगम के नाम के नीचे करोड़ो की सरकारी ज़मीन पर बना लिया आलीशान मकान व दुकान, कार्रवाई से क्यों हाथ कांप रहे अधिकारियों के ?
कोरबा ।
कोरबा शहर के बीचोंबीच स्थित करोड़ों रुपए की शासकीय नजूल भूमि को लेकर एक बड़ा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं । सामने आए दस्तावेज, राजस्व अभिलेख और खसरा नंबर इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि यह मामला साधारण अतिक्रमण नहीं बल्कि कथित रूप से सुनियोजित जमीन घोटाले का हिस्सा हो सकता है ।
मामला पटवारी हल्का नंबर 16, शहर नक्शा क्षेत्र का बताया जा रहा है, जहां जमीन की कीमत लगभग 10,000 रुपए प्रति वर्गफुट से अधिक आंकी जा रही है । यानी जिस भूमि पर विवाद है, उसकी कीमत सीधे करोड़ों में बैठती है । आरोप है कि तुषार ऐश्वर्या संचिता तथा अनीता देवी अग्रवाल, पति स्व. विनोद अग्रवाल के परिवार द्वारा खसरा नंबर 188/1/छ में दर्ज मात्र 5 डिसमिल भूमि को आधार बनाकर अन्य खसरा नंबर 199/5, 205/1, 205/13, 205/14 सहित विभिन्न भूखंडों के दस्तावेजों को कथित रूप से जोड़-तोड़ कर एक एकड़ से अधिक नजूल भूमि पर कब्जा कर लिया गया और वहां विशाल व्यावसायिक भवन का निर्माण कर लिया गया ।
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर नगर निगम कोरबा द्वारा शासकीय भूमि पर इतना बड़ा अतिक्रमण होते हुए भी करोड़ों रुपए की लागत से भवन कैसे खड़ा हो गया । हैरानी की बात यह है कि जहां गरीब मजदूर परिवार अपने कच्चे घर के छज्जे की मरम्मत करने भी उतरता है, वहां नगर निगम का दस्ता तुरंत पहुंचकर निर्माण कार्य रुकवा देता है, वहीं दूसरी ओर शहर के बीचोंबीच इतना विशाल भवन निर्माण प्रशासन की नजरों से कैसे ओझल रहा ।
क्या यह महज लापरवाही है या फिर पैसों की खनक और ऊपर तक पहुंच का असर, यह अब जांच का विषय बन गया है । नगर निगम, नजूल शाखा, तहसील कार्यालय और राजस्व विभाग की भूमिका इस पूरे मामले में सवालों के घेरे में है ।
स्थानीय स्तर पर लोगों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि कानून का डंडा सिर्फ गरीबों पर ही क्यों चलता है और प्रभावशाली लोगों के मामलों में प्रशासन की चुप्पी क्यों साध ली जाती है ।
दस्तावेजों और अभिलेखों के अनुसार इस पूरे प्रकरण में राजस्व रिकॉर्ड के साथ कथित छेड़छाड़ और भूमि के स्वरूप में बदलाव कर शासकीय संपत्ति पर कब्जा करने का प्रयास किया गया है, जिससे शासन को करोड़ों रुपए की संभावित क्षति हुई है ।
कानून बना, अब कार्रवाई होगी या फिर दिखावा
हाल ही में लोकसभा और राज्यसभा में शासकीय भूमि पर अवैध कब्जों को रोकने के लिए सख्त विधेयक पारित किया जा चुका है और राज्य सरकार को भी ऐसे मामलों में तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं । ऐसे में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में संज्ञान लेकर अवैध कब्जा हटाने की कार्रवाई करता है या फिर कानून को ठेंगा दिखाते हुए मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है ।
अब सीधा सवाल
क्या करोड़ों की नजूल भूमि पर बने इस भवन को कब्जा मुक्त कराया जाएगा
या फिर यह भी एक और दबा दिया गया मामला बनकर रह जाएगा

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