रंजना-चेतन का खेल फिर हुआ बेनकाब ! अपर कलेक्टर ने अपील की ख़ारिज, तीन साल से पहाड़ी कोरवा की ज़मीन-मकान पर कर रखा है कब्जा, तो अब फिरतराम को मिलेगा इंसाफ ? देखें आदेश
फर्जी रजिस्ट्री का सबसे बड़ा खुलासा ! मृत महिला के नाम पर जमीन हड़पने का खेल बेनकाब, 24 मार्च 2026 के आदेश में खुली रंजना–चेतन की साजिश… फिर भी कब्जा कायम !

कोरबा। कोरबा जिले में पहाड़ी कोरवा आदिवासी की पुश्तैनी जमीन पर कब्जे का मामला अब एक बड़े खुलासे के रूप में सामने आया है, जिसने न केवल राजस्व व्यवस्था बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ताजा घटनाक्रम में अपर कलेक्टर न्यायालय से दिनांक 24 मार्च 2026 को पारित आदेश ने इस पूरे प्रकरण में हुए फर्जीवाड़े को फिर से उजागर कर दिया है। प्रकरण क्रमांक 202411050100054/2024-25 में दिए गए इस आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि वर्ष 2007 में की गई जमीन की रजिस्ट्री संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी और इसमें कई गंभीर कानूनी खामियां पाई गई हैं।
इस पूरे मामले की जड़ में एक ऐसा तथ्य सामने आया है, जिसने सभी को चौंका दिया है। जिस महिला “बुंदकुंवर” के नाम पर जमीन की रजिस्ट्री दिखाई गई, उसकी मृत्यु वर्ष 1980 में ही हो चुकी थी, जबकि रजिस्ट्री वर्ष 2007 में दर्शाई गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि एक मृत महिला के नाम पर लगभग 27 साल बाद जमीन का सौदा दिखाकर पूरा खेल रचा गया। यह न केवल गंभीर कूटरचना का मामला है, बल्कि यह दर्शाता है कि योजनाबद्ध तरीके से दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ कर जमीन हड़पने की कोशिश की गई।
इस प्रकरण में रंजना सिंह की भूमिका सबसे ज्यादा विवादों में रही है। आरोप है कि उन्होंने खुद को आदिवासी बताते हुए फर्जी जाति प्रमाणपत्र का इस्तेमाल किया, ताकि पहाड़ी कोरवा समुदाय की जमीन अपने नाम कर सकें। लेकिन जांच के दौरान यह प्रमाणपत्र भी संदिग्ध पाया गया और जिला स्तरीय जाति छानबीन समिति द्वारा इसे निलंबित कर दिया गया। इसके बावजूद रंजना सिंह वर्षों से जमीन पर कब्जा बनाए हुए हैं, जो प्रशासनिक कार्यवाही पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
इस पूरे घटनाक्रम में चेतन चौधरी का नाम भी लगातार सामने आता रहा है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि जमीन कब्जा बनाए रखने, दस्तावेजी प्रक्रिया को प्रभावित करने और प्रशासनिक स्तर पर दबाव बनाने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कई बार जब प्रशासनिक टीम कब्जा हटाने के लिए मौके पर पहुंची, तब अचानक किसी प्रभावशाली व्यक्ति के हस्तक्षेप या फोन कॉल के बाद कार्रवाई रोक दी गई। कभी पुलिस बल की कमी का हवाला दिया गया, तो कभी अन्य कारणों से टीम को वापस लौटना पड़ा।
दूसरी ओर, इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा पीड़ा झेलने वाला व्यक्ति है फिरत राम (पहाड़ी कोरवा), जो अपनी ही पुश्तैनी जमीन के लिए वर्षों से संघर्ष कर रहा है। उसने सीमांकन कराया, न्यायालय में प्रकरण दायर किया, पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और बार-बार प्रशासन से गुहार लगाई, लेकिन उसे आज तक न्याय नहीं मिल पाया है। उसकी स्थिति ऐसी हो गई है कि कागजों में वह जमीन का वैध मालिक है, लेकिन जमीनी हकीकत में वह अपने ही घर से दूर है।
इस पूरे मामले में रंजना सिंह और चेतन चौधरी के खिलाफ कई आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं, जिनमें अतिक्रमण, मारपीट, धमकी और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने जैसी गंभीर धाराएं शामिल हैं। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस गिरफ्तारी या निर्णायक कार्रवाई नहीं हो पाई है, जिससे यह सवाल उठता है कि आखिर कानून का डर इन आरोपियों पर क्यों नहीं है।
तहसीलदार द्वारा बेदखली का आदेश पारित किया जा चुका है, अपर कलेक्टर द्वारा अपील खारिज की जा चुकी है और अब 24 मार्च 2026 के आदेश में भी फर्जीवाड़े की पुष्टि हो चुकी है। इसके बावजूद जमीन पर कब्जा यथावत बना हुआ है, जो प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी को उजागर करता है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि राजस्व विभाग द्वारा जानबूझकर “मोहलत देने का खेल” खेला जा रहा है। हर बार किसी न किसी बहाने से कार्रवाई को टाल दिया जाता है, जिससे कब्जाधारियों को समय मिलता रहता है और पीड़ित पक्ष न्याय के लिए भटकता रहता है। यह स्थिति अब आम जनता के बीच भी चर्चा का विषय बन चुकी है।
अब यह मामला केवल एक जमीन विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। एक तरफ फर्जी दस्तावेजों के सहारे कब्जा जमाने वाले लोग हैं, तो दूसरी तरफ एक वास्तविक आदिवासी है जो अपने हक के लिए संघर्ष कर रहा है।
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सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि जब न्यायालय बार-बार यह स्पष्ट कर रहे हैं कि फर्जीवाड़ा हुआ है और दस्तावेज अवैध हैं, तो फिर प्रशासन कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा ? क्या यह केवल लापरवाही है या फिर इसके पीछे कोई ऐसा प्रभावशाली तंत्र काम कर रहा है जो हर बार कार्रवाई को रोक देता है ?
फिलहाल, 24 मार्च 2026 का आदेश इस पूरे प्रकरण में एक और महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आया है। इसने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि मामला पूरी तरह फर्जीवाड़े पर आधारित है। अब देखना यह है कि यह आदेश भी अन्य आदेशों की तरह केवल कागजों तक सीमित रहेगा या फिर वास्तव में जमीन पर उतरकर एक पहाड़ी कोरवा को उसका हक दिलाएगा।
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