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CSR के नाम पर करोड़ों की हेराफेरी ? कैंसर हॉस्पिटल बना “कैश कन्वर्जन सेंटर”, बालको प्रबंधन पर सबसे बड़े आरोप

कोरबा से रायपुर तक फैला शक, गरीबों के इलाज के नाम पर करोड़ों का खेल ?


प्रदेश की औद्योगिक राजधानी कोरबा से उठी एक कहानी अब सीधे रायपुर के उस कैंसर हॉस्पिटल तक पहुंचती है, जिसे कभी गरीबों के इलाज का सहारा बताया गया था। लेकिन अब उसी अस्पताल को लेकर ऐसा आरोप सामने आया है, जो न सिर्फ एक कंपनी बल्कि पूरे CSR सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर देता है। सवाल सीधा है, लेकिन जवाब बेहद खतरनाक शक पैदा करता है — क्या CSR के नाम पर खर्च होने वाला करोड़ों का पैसा वास्तव में मरीजों तक पहुंच रहा है, या फिर यह पूरा सिस्टम एक संगठित वित्तीय खेल में बदल चुका है ?

बालको हर साल अपनी रिपोर्टों में सामाजिक जिम्मेदारी के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करता है। आंकड़ों में लाखों लोगों को लाभान्वित बताया जाता है, स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश की बड़ी तस्वीर पेश की जाती है, लेकिन जब इन दावों की परतें खोली जाती हैं तो सच्चाई कहीं ज्यादा असहज नजर आती है। रायपुर स्थित बालको कैंसर हॉस्पिटल, जिसे सरकारी जमीन लगभग मुफ्त में देकर स्थापित किया गया, अब उसी CSR फंड के बड़े हिस्से को समेटने का केंद्र बताया जा रहा है।

सूत्रों का दावा है कि कंपनी के CSR का 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा इसी अस्पताल में भेजा जाता है और यहीं से इस पैसे का असली खेल शुरू होता है। अंदरखाने की जानकारी रखने वाले लोग बताते हैं कि हर साल 15 से 30 करोड़ रुपये तक की रकम इस अस्पताल के जरिए घुमाई जाती है। आरोप यह है कि इस राशि को बाद में अलग-अलग माध्यमों से कैश में बदला जाता है, जिससे एक समानांतर वित्तीय तंत्र तैयार हो जाता है।

“अगर करोड़ों रुपये अस्पताल को दिए जा रहे हैं, तो मरीजों को राहत क्यों नहीं मिल रही ?”

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस अस्पताल को गरीबों के इलाज के लिए बनाया गया, वहां इलाज सस्ता नहीं बल्कि कई मामलों में अन्य निजी अस्पतालों से भी महंगा बताया जा रहा है। मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि उन्हें किसी तरह की विशेष आर्थिक रियायत नहीं मिलती, जबकि कागजों में स्वास्थ्य सेवाओं पर करोड़ों खर्च दिखाया जाता है।

इस पूरे मामले में बालको के CEO राजेश कुमार का नाम भी प्रमुखता से सामने आ रहा है। सूत्रों का कहना है कि उनकी पदस्थापना के बाद CSR फंड का यह पैटर्न तेजी से बढ़ा है और कैंसर हॉस्पिटल को बड़े पैमाने पर फंड ट्रांसफर होने लगा है। आरोप यह भी है कि CSR के नाम पर शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और विकास योजनाओं का दिखावा जरूर किया जाता है, लेकिन असली धनराशि एक ही केंद्र में केंद्रित रहती है।

“कोरबा में प्रदूषण और बीमारी, लेकिन CSR का पैसा रायपुर में — आखिर क्यों ?”

कोरबा के लोग, जो सालों से उद्योग का बोझ झेल रहे हैं, अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि उनके हिस्से का CSR आखिर कहां जा रहा है। प्रदूषण, ट्रैफिक और स्वास्थ्य समस्याएं कोरबा झेले और CSR का पैसा रायपुर में खपाया जाए — यह बात स्थानीय लोगों के गले नहीं उतर रही।

बालको की रिपोर्टों में लाभार्थियों की संख्या, योजनाओं के नाम और सामाजिक प्रभाव की बातें तो विस्तार से बताई जाती हैं, लेकिन खर्च का स्पष्ट और पारदर्शी विवरण नहीं दिया जाता। यही वह खाली जगह है, जहां सबसे बड़ा शक जन्म लेता है। अगर सब कुछ सही है तो प्रोजेक्टवार खर्च क्यों नहीं दिखाया जाता ?

CSR के नाम पर करोड़ों रुपये आखिर जा कहां रहे हैं ?
 
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