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CSR के करोड़ों… फिर भी गांव में सूखा नल! बालको के सामाजिक खर्च पर उठने लगे बड़े सवाल

कोरबा। कोरबा जिले में संचालित बड़ी औद्योगिक इकाई भारत एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) वेदांता के कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) खर्च को लेकर अब संदेहास्पद स्थिति सामने आने लगी है। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क के पास उपलब्ध दस्तावेज, वार्षिक रिपोर्टों और सार्वजनिक सूचनाओं के प्रारंभिक विश्लेषण में कई ऐसे बिंदु सामने आए हैं जो CSR मद में खर्च किए गए करोड़ों रुपये के वास्तविक उपयोग पर सवाल खड़े करते हैं। उद्योग प्रभावित गांवों में अब भी पेयजल, स्वास्थ्य सुविधा और बुनियादी विकास की कमी के बीच यह प्रश्न उठ रहा है कि जब CSR के नाम पर हर साल बड़ी राशि खर्च होने का दावा किया जाता है, तो आखिर उसका जमीनी असर क्यों दिखाई नहीं देता।

कोरबा देश के प्रमुख औद्योगिक जिलों में गिना जाता है। यहां बिजली, कोयला और एल्यूमिनियम उद्योगों की बड़ी इकाइयां संचालित होती हैं। इन उद्योगों की गतिविधियों से जहां देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है, वहीं स्थानीय स्तर पर उद्योग प्रभावित गांवों के विकास की जिम्मेदारी भी कंपनियों से अपेक्षित होती है। इसी उद्देश्य से भारत सरकार ने कंपनियों को सामाजिक विकास के कार्यों में योगदान देने के लिए CSR की व्यवस्था लागू की है।

क्या है CSR का कानून

भारत सरकार ने कंपनियों को समाज के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 135 के तहत कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) को अनिवार्य बनाया। यह प्रावधान 1 अप्रैल 2014 से प्रभावी हुआ। इसके तहत उन कंपनियों को CSR पर खर्च करना अनिवार्य है जिनकी नेट वर्थ 500 करोड़ रुपये या उससे अधिक हो, या वार्षिक टर्नओवर 1000 करोड़ रुपये से अधिक हो, अथवा शुद्ध लाभ 5 करोड़ रुपये से अधिक हो।

ऐसी कंपनियों को अपने पिछले तीन वर्षों के औसत शुद्ध लाभ का कम से कम 2 प्रतिशत हिस्सा सामाजिक विकास के कार्यों पर खर्च करना होता है। CSR के तहत शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण, कौशल विकास और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में काम करने की अपेक्षा की जाती है।

जमीनी स्तर पर क्यों उठ रहे सवाल

कोरबा जिले के कई ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का कहना है कि उद्योगों की मौजूदगी के बावजूद उनके गांवों में बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी हुई है। कई गांवों में गर्मियों के दौरान पेयजल संकट गंभीर हो जाता है और लोगों को पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

ग्रामीणों का कहना है कि CSR के नाम पर कई योजनाओं और कार्यक्रमों की जानकारी तो सामने आती है, लेकिन उनका प्रभाव सीमित दिखाई देता है। लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि कंपनियां CSR के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही हैं, तो उद्योग प्रभावित गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति में व्यापक सुधार क्यों नहीं दिखता।

बालको कैंसर अस्पताल पर भी चर्चा

CSR खर्च को लेकर चर्चा का एक बड़ा केंद्र बालको कैंसर हॉस्पिटल भी बना हुआ है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा होती रही है कि CSR मद का एक बड़ा हिस्सा इस अस्पताल से जुड़ी गतिविधियों में खर्च दिखाया जाता है।

हालांकि इस संबंध में यह सवाल भी उठाया जाता है कि यदि CSR का पैसा अस्पताल के विकास में लगाया जा रहा है तो क्या वहां गरीब और जरूरतमंद मरीजों को पर्याप्त स्तर पर निःशुल्क या सुलभ उपचार उपलब्ध हो रहा है। यदि इलाज महंगा है और आम गरीब परिवार उसकी पहुंच से बाहर हैं, तो CSR खर्च के सामाजिक प्रभाव पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

CSR नियमों में पारदर्शिता की अपेक्षा

CSR कानून केवल खर्च दिखाने तक सीमित नहीं है बल्कि उसके उपयोग की जवाबदेही भी तय करता है। कंपनी (CSR नीति) नियम 2014 के नियम 4(5) के अनुसार कंपनी के बोर्ड की जिम्मेदारी होती है कि CSR के लिए स्वीकृत राशि उसी उद्देश्य के लिए खर्च हो, जिसके लिए उसे मंजूरी दी गई है।

इसके साथ ही कंपनी के मुख्य वित्तीय अधिकारी या संबंधित अधिकारी को यह प्रमाणित करना होता है कि CSR राशि का उपयोग नियमों के अनुरूप किया गया है। कंपनियों को अपने CSR खर्च का विवरण अपनी वार्षिक रिपोर्ट में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना भी अनिवार्य है।

छत्तीसगढ़ में CSR का बड़ा आंकड़ा

केंद्रीय कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ में संचालित विभिन्न कंपनियों ने पिछले तीन वर्षों में करीब 1349.51 करोड़ रुपये CSR मद में खर्च करने का दावा किया है। यह राशि यदि सही तरीके से उपयोग की जाए तो राज्य के कई पिछड़े क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बदलाव लाने में मदद कर सकती है।

हालांकि यह भी देखा गया है कि कई बार CSR फंड का बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा परियोजनाओं या संस्थानों तक सीमित रह जाता है, जबकि उद्योग प्रभावित गांवों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाता।

अब उठ रही पारदर्शिता की मांग

कोरबा में अब CSR खर्च की पारदर्शिता को लेकर आवाज उठने लगी है। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि CSR योजनाओं को उद्योग प्रभावित गांवों की वास्तविक जरूरतों के अनुसार लागू किया जाना चाहिए।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि CSR परियोजनाओं का स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट किया जाना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि खर्च की गई राशि से वास्तविक सामाजिक लाभ कितना हुआ। इससे उद्योगों और समाज के बीच विश्वास भी मजबूत हो सकता है।

जल्द सामने आ सकती है विस्तृत पड़ताल

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क की टीम इस पूरे मामले से जुड़े दस्तावेजों, वार्षिक रिपोर्टों और CSR खर्च से संबंधित उपलब्ध जानकारियों का विस्तृत विश्लेषण कर रही है। प्रारंभिक जांच और दस्तावेजों के अध्ययन में कई संभावित अनियमितताओं और सवाल खड़े करने वाले तथ्यों के संकेत मिले हैं। टीम द्वारा इन सभी पहलुओं की गहराई से पड़ताल की जा रही है।

जल्द ही इस विषय पर विस्तृत रिपोर्ट और तथ्यों पर आधारित खुलासा ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क के माध्यम से प्रसारित किया जाएगा, जिसमें यह स्पष्ट करने की कोशिश होगी कि CSR के नाम पर किए गए दावों की वास्तविकता क्या है और उद्योग प्रभावित क्षेत्रों को उससे कितना लाभ मिला।

अब बड़ा सवाल यही है—क्या CSR के करोड़ों रुपये वास्तव में आम लोगों की जिंदगी बदल रहे हैं, या फिर वे केवल रिपोर्टों और दावों तक सीमित रह गए हैं?

 
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