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कोरबा में जमीन का बड़ा खेल उजागर : वन भूमि से निजी दावे तक , खसरा 422 – 588 में डबल रिकॉर्ड , जमीन दलाल मनोज ठाकुर – सुमित दान के नाम आए फिर सामने, नकटीखार में 2005 से 2026 तक जमीन का बदलता स्वरूप — संयुक्त खातेदारी , धारा 89 दुरुस्ती और अब एकल दावा , करोड़ों की जमीन पर सवाल

कोरबा । जिले के ग्राम नकटीखार में सामने आया जमीन से जुड़ा मामला अब एक साधारण राजस्व त्रुटि नहीं बल्कि एक गंभीर और बहुस्तरीय रिकॉर्ड विसंगति के रूप में उभर रहा है , जिसमें एक ही भूमि को अलग – अलग चरणों में अलग – अलग तरीके से प्रस्तुत किया गया है । दस्तावेजों की समयरेखा , पूर्व प्रकरणों और नवीन आवेदन के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि खसरा नंबर 422 और उसके पश्चात निर्धारित खसरा नंबर 588 के बीच संबंध को लेकर अभिलेखों में निरंतर असंगति बनी रही है । जमीन दलाल मनोज की भूमिका फिर संदेहास्पद है।

इस पूरे प्रकरण की जड़ वर्ष 2005 – 06 के मसाहती सर्वे से जुड़ी हुई है , जब ग्राम नकटीखार में संबंधित भूमि समारू राम यादव के नाम पर दर्ज की गई । यह वह आधार प्रविष्टि थी , जिसके आधार पर आगे का पूरा रिकॉर्ड तैयार हुआ ।

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बंदोबस्त प्रक्रिया में उक्त भूमि को नया खसरा नंबर 588 प्रदान किया गया । सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुसार पुराने खसरा नंबर 422 को समाप्त माना जाना चाहिए था , किन्तु उपलब्ध अभिलेखों में यह स्थिति सामने आती है कि दोनों खसरा नंबर समानांतर रूप से अस्तित्व में बने रहे ।

यानी एक ही जमीन दो खसरा नंबरों में जिंदा रखी गई ।

यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण और संदिग्ध बिंदु है , क्योंकि यह स्थिति भविष्य में उसी भूमि पर अलग – अलग दावे प्रस्तुत करने की संभावना पैदा करती है ।

वर्ष 2021 में इसी भूमि से संबंधित प्रकरण क्रमांक 202109052600035 (स्थानीय रूप से “35 वाला मामला”) के तहत धारा 89 छत्तीसगढ़ भू – राजस्व संहिता , 1959 के अंतर्गत अभिलेख दुरुस्ती की कार्यवाही की गई ।

इस प्रकरण में भूमि संयुक्त खातेदारी में दर्ज थी , जिसमें एक से अधिक व्यक्तियों के नाम शामिल थे ।

अर्थात उस समय भूमि का स्वरूप सामूहिक था ।

धारा 89 का उद्देश्य अभिलेखों में हुई त्रुटियों को सुधारना होता है , किन्तु इस प्रकरण में यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि दोहरी खसरा प्रविष्टि की स्थिति को किस प्रकार समाप्त किया गया ।

मामले का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ वर्ष 2026 में आता है । दिनांक 08 / 01 / 2026 को आवेदन क्रमांक 2026015001053 प्रस्तुत किया गया , जिसमें आवेदक समारू राम यादव द्वारा खसरा नंबर 422 रकबा 0.620 हेक्टेयर भूमि पर एकल दावा प्रस्तुत किया गया है ।

यहां सबसे बड़ा परिवर्तन यही है —

जहां 2021 में भूमि संयुक्त खातेदारी में थी , वहीं 2026 में उसी भूमि पर एकल दावा प्रस्तुत किया गया ।

यह स्थिति गंभीर प्रश्न उत्पन्न करती है । क्या इस बीच भूमि का विधिवत बंटवारा हुआ ? यदि हुआ तो उसका रिकॉर्ड कहां है ? यदि नहीं , तो एकल दावा किस आधार पर प्रस्तुत किया गया ?

आवेदन में यह भी स्पष्ट उल्लेख है कि संबंधित भूमि का नया खसरा नंबर 588 पहले से अस्तित्व में है । इसके बावजूद पुराने खसरा नंबर 422 के आधार पर दावा प्रस्तुत किया गया है ।

यह दर्शाता है कि दोहरी प्रविष्टि की स्थिति का उपयोग किया जा रहा है ।

इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू यह है कि संबंधित भूमि को लेकर यह संकेत भी सामने आया है कि वह पूर्व में वन स्थापना अथवा शासकीय श्रेणी से जुड़ी रही है ।

यदि यह तथ्य सत्य है तो यह मामला अत्यंत गंभीर हो जाता है — क्योंकि प्रश्न यह उठता है कि वन या शासकीय भूमि निजी दावे तक कैसे पहुंची ?

यह केवल एक जमीन का मामला नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर प्रश्न खड़ा करता है ।

स्थानीय स्तर पर इस मामले को लेकर विभिन्न चर्चाएं भी सामने आ रही हैं । सूत्रों के अनुसार मनोज ठाकुर और सुमित दान के नाम इस प्रकरण में चर्चा में बताए जा रहे हैं । हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है ।

सूत्रों का कहना है कि इस प्रकार के मामलों में राजस्व रिकॉर्ड की जटिलताओं का लाभ उठाकर एक ही भूमि को अलग – अलग रूपों में प्रस्तुत किया जाता है , जिससे भविष्य में कई प्रकार के दावे संभव हो जाते हैं ।

बताया जाता है कि दस्तावेजों की प्रविष्टि , रिपोर्ट और फाइलों की प्रक्रिया को इस प्रकार प्रभावित किया जाता है कि रिकॉर्ड में दोहरी स्थिति बनी रहे और आगे चलकर उसी का उपयोग किया जा सके ।

यदि पूरे घटनाक्रम को क्रमवार देखा जाए तो एक स्पष्ट पैटर्न सामने आता है —

पहले सर्वे में नाम दर्ज हुआ , फिर बंदोबस्त में नया खसरा बना लेकिन पुराना समाप्त नहीं किया गया , उसके बाद धारा 89 के तहत दुरुस्ती की गई और अंततः उसी भूमि पर पुनः दावा प्रस्तुत कर दिया गया ।

यह एक ऐसा चक्र है जिसमें एक ही जमीन को बार – बार अलग – अलग रूपों में उपयोग किया जा सकता है ।

इस पूरे मामले में पारदर्शिता का मुद्दा भी सामने आता है । सामान्यतः राजस्व न्यायालय के सभी प्रकरण ऑनलाइन उपलब्ध रहते हैं , किन्तु इस प्रकरण से जुड़े सभी दस्तावेज पूर्ण रूप से ऑनलाइन उपलब्ध नहीं हैं ।

यह स्थिति भी जांच का विषय है और यह आवश्यक हो जाता है कि अभिलेखों की पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए ।

अब इस पूरे मामले में कई बड़े प्रश्न खड़े होते हैं —

एक ही भूमि दो खसरा नंबरों में क्यों दर्ज रही ? संयुक्त खातेदारी से एकल दावा कैसे बना ? नया खसरा होने के बावजूद पुराने खसरे पर दावा क्यों किया जा रहा है ? और क्या यह केवल त्रुटि है या फिर इसके पीछे कोई संगठित तंत्र कार्यरत है ?

यह मामला केवल नकटीखार तक सीमित नहीं है , बल्कि यह पूरे राजस्व सिस्टम की विश्वसनीयता और पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है ।

अब आवश्यकता इस बात की है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कर वास्तविक स्थिति को सामने लाया जाए और जिम्मेदारी तय की जाए ।

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