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CMHO कारनामा पार्ट 2 : फ्लैट से चलने वाली फर्म, कागजों में सप्लाई और दफ्तर में नदारद इंटरकॉम ! बिल को दो हिस्सों में बांटकर कैसे सिस्टम से हो रहा खेला

कोरबा : कोरबा स्वास्थ्य विभाग में एसी खरीदी को लेकर उठे सवालों के बीच अब एक और परत खुलती नजर आ रही है। इस बार मामला सिर्फ एक खरीदी का नहीं, बल्कि उस सिस्टम का है जिसे एक व्यक्ति और उससे जुड़ी फर्में लंबे समय से अपनी उंगलियों पर नचाती चली आ रही हैं। साइंटिफिक इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, जिसका नाम कागजों में भले एक कंपनी के रूप में दर्ज है, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसे दिनेश अग्रवाल से जुड़ी फर्म के रूप में देखा जाता है, उसी नेटवर्क का एक अहम हिस्सा बताई जाती है।

एक आदमी, तीन फर्में और एक स्क्रिप्ट ! कोरबा स्वास्थ्य विभाग में एसी खरीदी के नाम पर जमकर हुआ खेल, 19 लाख में खरीदी जा रही एक एसी, दरें खुलते ही पूरा गठजोड़ बेनकाब

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जानकारी के अनुसार यह फर्म दिनेश अग्रवाल की पत्नी के नाम पर संचालित बताई जाती है और हैरानी की बात यह है कि इसका संचालन किसी व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स या बड़े ऑफिस से नहीं, बल्कि एक रिहायशी कॉलोनी के फ्लैट के भीतर से किया जाता रहा है। कागजों में कंपनी, लेकिन जमीनी स्तर पर एक दुकान जैसी व्यवस्था — इस विरोधाभास ने पहले से ही कई सवाल खड़े कर रखे हैं। (इस फर्म की वास्तविक स्थिति और विवरण पर अगली कड़ी में विस्तार से खुलासा किया जाएगा।)

इसी फर्म द्वारा सीएमएचओ कार्यालय को इंटरकॉम सिस्टम सप्लाई किया गया था। कागजों के अनुसार यह पूरा सेटअप ऐसा बताया गया कि एक कमरे में बैठे अधिकारी या कर्मचारी दूसरे कमरे में बैठे लोगों से आसानी से बातचीत कर सकें। सप्लाई में 24 पोर्ट इंटरकॉम, 2 मास्टर टेलीफोन, 2 कॉलर आईडी फोन और 16 नॉर्मल टेलीफोन दिए जाने का जिक्र बिल में दर्ज है।

लेकिन कहानी यहीं से संदिग्ध हो जाती है। बिल में सप्लाई का उल्लेख तो है, लेकिन इंस्टालेशन का कहीं कोई जिक्र नहीं है। यानी सामान दिया गया, पर लगाया गया या नहीं — इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं मिलता।

और इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि सीएमएचओ कार्यालय में काम करने वाले कई कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने आज तक न तो वह इंटरकॉम सिस्टम देखा, न ही वायरिंग, न ही वे टेलीफोन जिनका भुगतान विभाग द्वारा किया जा चुका है।

ऐसे में सवाल अपने आप खड़ा होता है — अगर इंटरकॉम और फोन दिए गए थे, तो वे लगे कहां? और अगर लगे, तो किसी की नजर आज तक उन पर क्यों नहीं पड़ी?

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इस पूरे मामले में दो ही संभावनाएं सामने आती हैं — या तो यह सामान कभी लगाया ही नहीं गया, या फिर सप्लाई के बाद उसका उपयोग कार्यालय में हुआ ही नहीं। विभाग के भीतर चर्चा तो यहां तक है कि इस खरीदी की जानकारी केवल चुनिंदा लोगों तक ही सीमित रही — जिनमें उस समय के सीएमएचओ, डिस्ट्रिक्ट अकाउंट मैनेजर और सप्लायर पक्ष से जुड़े लोग शामिल बताए जाते हैं।

50 हजार की सीमा से बचने के लिए बिल को दो हिस्सों में बांटा

भंडार क्रय नियमों के मुताबिक 50 हजार रुपये से अधिक की खरीदी होने पर कम से कम तीन फर्मों से कोटेशन लेना अनिवार्य होता है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे और प्रतिस्पर्धा के आधार पर दरें तय हों। लेकिन इस नियम से बचने के लिए कथित तौर पर एक अलग ही तरीका अपनाया गया।

जानकारी के अनुसार इंटरकॉम और टेलीफोन की पूरी खरीदी को एक साथ दिखाने के बजाय बिल को दो हिस्सों में बांट दिया गया। पहले बिल में 24 पोर्ट इंटरकॉम की कीमत 48,500 रुपये दिखाई गई, जबकि दूसरे बिल में 2 मास्टर टेलीफोन, 2 कॉलर आईडी फोन और 16 नॉर्मल फोन की कीमत 49,440 रुपये दर्ज की गई।

ध्यान देने वाली बात यह है कि दोनों बिल की राशि जानबूझकर 50 हजार रुपये से कम रखी गई, ताकि तीन फर्मों से कोटेशन लेने की बाध्यता से बचा जा सके। नियमों की जानकारी रखने वाले जानकारों का मानना है कि इस तरह की बिलिंग संयोग नहीं हो सकती, बल्कि यह साफ तौर पर नियमों को किनारे करने की एक सोची-समझी रणनीति की ओर इशारा करती है।

यानी एक ही खरीदी, दो हिस्सों में बांटकर दिखाई गई और कागजों में सब कुछ नियमों के दायरे में दिखा दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी भूमिका डिस्ट्रिक्ट अकाउंट मैनेजर और सीएमएचओ की मानी जा रही है, जिन पर आरोप है कि उन्होंने ही बिल को दो टुकड़ों में विभाजित करने का तरीका निकाला, ताकि प्रक्रिया कागजों में सही दिखाई दे और किसी तरह का औपचारिक कोटेशन प्रोसेस शुरू ही न करना पड़े।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस इंटरकॉम और टेलीफोन सेटअप के नाम पर विभागीय राशि खर्च की गई, उसका वास्तविक उपयोग आज तक किसने देखा? अगर वह सिस्टम वास्तव में लगाया गया होता, तो कार्यालय में काम करने वाले कर्मचारियों, अधिकारियों या आगंतुकों में से किसी न किसी की नजर जरूर पड़ती। लेकिन जब सालों बाद भी उसका कोई स्पष्ट अस्तित्व नजर नहीं आता, तो यह पूरा मामला और ज्यादा गंभीर हो जाता है।

यह घटनाक्रम केवल एक छोटी खरीदी का मामला नहीं है, बल्कि यह बताता है कि किस तरह नियमों की बारीकियों का इस्तेमाल कर प्रक्रिया को इस तरह मोड़ा जाता है कि कागजों में सब कुछ सही दिखाई दे और जमीन पर सवाल उठाने की गुंजाइश ही न बचे। एक रिहायशी फ्लैट से संचालित होने वाली फर्म को विभाग में सप्लाई का काम मिलना, बिल को नियमों से नीचे रखने के लिए दो हिस्सों में बांटना और सप्लाई किए गए सामान का कार्यालय में कोई स्पष्ट निशान तक न मिलना — ये सब मिलकर उस सिस्टम की तस्वीर पेश करते हैं, जो लंबे समय से बिना शोर के चलता रहा।

साइंटिफिक इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और उससे जुड़े नामों की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। विभाग में किन-किन कामों में इन फर्मों की भूमिका रही, कैसे-कैसे भुगतान हुए और किन परिस्थितियों में उन्हें काम मिलता रहा — इन तमाम पहलुओं पर “ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़” आगे भी सिलसिलेवार खुलासे करता रहेगा…

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