12/04/2026

CMHO का कारनामा पार्ट-4 : दिनेश अग्रवाल की कथित कंपनी ने दिया 22 लाख 91 हजार का कम्प्यूटर बिल, दफ्तर में सिर्फ 5 मौजूद — दर, दस्तावेज़ और प्रक्रिया तीनों पर उठे सवाल…

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कोरबा। स्वास्थ्य विभाग में एसी खरीदी को लेकर उठे सवाल अभी थमे भी नहीं थे कि अब कम्प्यूटर और आईटी उपकरणों की सप्लाई का मामला सामने आ गया है। 25 दिसंबर 2022 को जारी इनवॉइस संख्या SIPL/K/21-22/134 के अनुसार “Scientific India Private Limited” नामक फर्म द्वारा C.M.& H.O. कार्यालय को डेस्कटॉप, प्रिंटर, UPS, डेटा कार्ड, सॉफ्टवेयर लाइसेंस और इंटरनेट रिचार्ज की सप्लाई दर्शाई गई है। इस बिल की कुल राशि 22,91,689 रुपये है।

लेकिन जब इस बिल को बाजार दरों, भौतिक उपलब्धता और खरीद प्रक्रिया के मानकों के आधार पर परखा गया, तो कई गंभीर प्रश्न सामने आए। मामला केवल महंगी खरीदी का नहीं बल्कि वित्तीय अनुशासन, तकनीकी पारदर्शिता और प्रशासनिक नियंत्रण का बनता दिख रहा है।

बिल में क्या दर्शाया गया ?

  • 30 Desktop Set
  • 30 Laser Printer
  • 30 UPS
  • 12 Data Card
  • 30 Windows 10 Pro 64 Bit
  • 12 Internet Recharge
  • 30 Quick Heal Total Security

इन मदों का कुल योग 22,91,689 रुपये तक पहुंचता है।

तुलनात्मक अध्ययन : बिल बनाम संभावित बाजार मूल्य

उसी अवधि की औसत बाजार दरों के आधार पर तैयार तुलनात्मक विश्लेषण निम्न है। बिल में ब्रांड और विस्तृत कॉन्फिग्रेशन का अभाव होने के कारण औसत बाजार दर को आधार माना गया है।

आइटममात्राबिल दर (रुपये)बिल कुलऔसत बाजार दरसंभावित बाजार कुलअनुमानित अतिरिक्त भुगतान
Desktop Set3038,94011,68,20019,0005,70,0005,98,200
Laser Printer3024,4857,34,55012,5003,75,0003,59,550
UPS305,3101,59,3001,80054,0001,05,300
Data Card121,12113,4523504,2009,252
Windows 10 Pro301,96458,92040012,00046,920
Internet Recharge129,4401,13,2802,50030,00083,280
Quick Heal301,12133,63035010,50023,130

कुल बिल राशि : 22,91,689 रुपये
संभावित बाजार लागत : लगभग 10,55,700 रुपये
संभावित अंतर : लगभग 12,35,989 रुपये

यदि औसत बाजार दरों को आधार माना जाए, तो बिल की राशि लगभग दोगुनी बैठती है। अंतिम दर ब्रांड और गुणवत्ता पर निर्भर हो सकती है, लेकिन बिल में उन विवरणों का अभाव तुलना को और महत्वपूर्ण बना देता है।

तकनीकी विवरण का अभाव

इनवॉइस में न तो डेस्कटॉप का ब्रांड दर्ज है, न प्रोसेसर जेनरेशन, न RAM स्पीड, न वारंटी अवधि। प्रिंटर का मॉडल नहीं, UPS की क्षमता नहीं, सॉफ्टवेयर लाइसेंस का सीरियल नंबर (जेन्युन) स्पष्ट नहीं। GST ब्रेकअप भी स्पष्ट रूप से अंकित नहीं है।

सरकारी खरीद में तकनीकी स्पेसिफिकेशन और ब्रांड विवरण अनिवार्य माने जाते हैं, ताकि भविष्य में ऑडिट और सत्यापन में स्पष्टता बनी रहे। ऐसे में सामान्यीकृत बिलिंग प्रक्रिया सवाल खड़े करती है।

दो महीने बाद दर बदली

15 फरवरी 2023 को इसी फर्म द्वारा i5 डेस्कटॉप (1TB हार्डडिस्क, 8GB RAM) 34,811.18 रुपये प्रति यूनिट की दर से सप्लाई दर्शाई गई। यह पिछली दर से लगभग 4,000 रुपये कम है, लेकिन बाजार में समान कॉन्फिग्रेशन लगभग 24,000-25,000 रुपये में उपलब्ध बताया जाता है।

Windows 11, जो Bulk में लगभग 500 रुपये में उपलब्ध बताया जाता है, उसे 3,500 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिल किया गया।

33 कम्प्यूटर का रिकॉर्ड, दफ्तर में सिर्फ 5 मौजूद

दस्तावेज़ों में कुल 33 कम्प्यूटर सप्लाई दर्शाए गए हैं। लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार कार्यालय में मात्र 5 कम्प्यूटर ही मौजूद हैं।
यदि इस थ्योरी को भी माना जाए कि शेष कम्प्यूटर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को भेजे गए, तो भी पांचों केंद्रों में एक से अधिक कम्प्यूटर उपलब्ध नहीं बताए जाते। और यह भी स्पष्ट नहीं कि वे इसी बिल की सप्लाई के हैं या पूर्व से मौजूद।

  • क्या वितरण सूची उपलब्ध है ?
  • क्या इंस्टॉलेशन रिपोर्ट तैयार हुई ?
  • क्या स्टॉक रजिस्टर में प्रविष्टि दर्ज है ?
  • यदि CHC भेजे गए तो पांचों केंद्रों में कितने स्थापित हैं ?

बिना टेंडर, बिना RC, बिना वर्क ऑर्डर ?

सूत्रों के अनुसार इस सप्लाई के लिए न तो खुली टेंडर प्रक्रिया अपनाई गई और न ही किसी वैध रेट कॉन्ट्रैक्ट का उल्लेख मिलता है। औपचारिक कार्यादेश (वर्क ऑर्डर) जारी किए जाने का रिकॉर्ड भी स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं बताया जाता।
यदि सप्लाई बिना टेंडर और बिना वर्क ऑर्डर हुई, तो यह सरकारी खरीद प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों से विचलन माना जाएगा। सामान्यतः किसी भी विभागीय खरीदी में —
प्रतिस्पर्धी दर परीक्षण
तकनीकी स्वीकृति
विधिवत कार्यादेश
सप्लाई के बाद भौतिक सत्यापन
अनिवार्य माने जाते हैं।

रिसीव भी वही, भुगतान फाइल भी वही

इस मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार संबंधित सप्लाई की स्टॉक एंट्री डिस्ट्रिक्ट अकाउंट मैनेजर द्वारा की गई और भुगतान के लिए फाइल भी उसी अधिकारी द्वारा आगे बढ़ाई गई।

यानी जिस अधिकारी ने सामग्री प्राप्त दर्शाई, उसी ने भुगतान स्वीकृति की फाइल प्रोसेस की। इसके बाद बिल और PFMS (Public Financial Management System) दस्तावेज़ों पर तत्कालीन CMHO डॉ. सूर्यनारायण केशरी द्वारा हस्ताक्षर कर भुगतान स्वीकृत किया गया।

सरकारी वित्तीय प्रणाली में “सेग्रिगेशन ऑफ ड्यूटी” एक मूल सिद्धांत है — रिसीविंग, वेरिफिकेशन और पेमेंट प्रोसेसिंग अलग स्तरों पर होनी चाहिए। यदि सभी प्रारंभिक प्रक्रियाएं एक ही स्तर से संचालित हुईं, तो आंतरिक नियंत्रण तंत्र पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

अब मामला सिर्फ दरों का नहीं

यह कहानी केवल महंगी खरीदी की नहीं है। यह मामला है मूल्य निर्धारण की पारदर्शिता, तकनीकी स्पष्टता, भौतिक उपलब्धता और वित्तीय नियंत्रण का। यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप है, तो विभाग को टेंडर विवरण, कार्यादेश, वितरण सूची और स्टॉक रजिस्टर सार्वजनिक करने चाहिए।यह केवल महंगी खरीदी का मामला नहीं है।
यह मामला है —

  • मूल्य निर्धारण की पारदर्शिता का,
  • तकनीकी विवरण की स्पष्टता का,
  • भौतिक उपलब्धता का,
  • और वित्तीय नियंत्रण तंत्र का।
    यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप है, तो विभाग को निम्न दस्तावेज़ सार्वजनिक करने चाहिए —
  • टेंडर/RC विवरण
  • कार्यादेश की प्रति
  • वितरण सूची
  • इंस्टॉलेशन रिपोर्ट
  • स्टॉक रजिस्टर एंट्री
  • भुगतान स्वीकृति फाइल नोटिंग
    जब तक यह स्पष्ट नहीं होता, तब तक 22 लाख 91 हजार रुपये की यह खरीदी सवालों के घेरे में रहेगी।

अगले अंक में पढ़िए — कैसे फ्लैट से संचालित इस कथित कंपनी ने विभागीय खरीदियों में लगातार पैटर्न बनाया। खुलासा जारी रहेगा।

 
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