
कोरबा।
महिला एवं नाबालिगों से जुड़े अपराधों में सख्ती और त्वरित कार्रवाई के दावों के बीच कोरबा से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं ? सवाल यह नहीं कि नाबालिग क्यों लापता हुई, सवाल यह है कि क्या एक बकरे और दस हजार रुपये के बदले पुलिस ने एक बेटी को उसके परिवार से अलग कर दिया ?
पसान थाना क्षेत्र से सामने आए इस सनसनीखेज मामले में आरोप है कि नाबालिग बालिका के अपहरण के आरोपी को कथित लेन-देन के बाद पुलिस कर्मियों ने छोड़ दिया, और इसी का नतीजा रहा कि घर लौटने के कुछ ही घंटों बाद नाबालिग दोबारा लापता हो गई। बदहवास पीड़ित परिवार न्याय की आस लेकर पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचा, लेकिन अब तक उन्हें केवल जांच का भरोसा ही मिला है।
पीड़ित परिवार के अनुसार उनकी नाबालिग बेटी 26 नवंबर को साप्ताहिक बाजार जाने की बात कहकर घर से निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी। परिजनों ने युवक के साथ अंतिम बार देखे जाने की जानकारी देते हुए थाना पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। इसके बावजूद पुलिस ने नामजद आरोपी के बजाय अज्ञात के खिलाफ अपहरण का मामला दर्ज किया।
क्या यह लापरवाही थी या किसी सौदे की शुरुआत ?
2 जनवरी को पसान थाने से फोन कर पीड़ित परिवार को बुलाया गया। थाना पहुंचने पर दस्तावेजों में हस्ताक्षर कराए गए और कटघोरा न्यायालय में बयान दर्ज कराने की बात कही गई। परिजन नाबालिग के साथ वाहन में बैठकर पहुंचे, लेकिन किसी कारणवश बयान दर्ज नहीं हो सका। इसके बाद पुलिस कर्मियों ने नाबालिग को परिजनों के साथ घर लौट जाने की सलाह दे दी।
घर पहुंचने के बाद नाबालिग ने जो जानकारी दी, उसने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया। बालिका ने बताया कि आरोपी युवक से एक एसआई कुर्रे और आरक्षक मधुकर ने दस हजार रुपये लिए, साथ ही बकरे की भी मांग की गई। इतना ही नहीं, नाबालिग के दिमाग में यह बात बैठा दी गई कि बयान दर्ज होने के बाद वह आरोपी के साथ जा सकती है।
क्या यह पुलिस की भूमिका थी या खुलेआम कानून से खिलवाड़ ?
इस बहकावे का असर यह हुआ कि करीब आधे घंटे के भीतर नाबालिग बिना बताए फिर घर से निकल गई। परिजनों ने उसी रात पसान पुलिस को इसकी सूचना दी, लेकिन आरोप है कि इसके बाद नाबालिग के संबंध में पूछताछ करने पर उन्हें धमकियां मिलने लगीं।
क्या सवाल पूछना अब अपराध बन चुका है ?
पीड़ित परिवार का कहना है कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि नाबालिग बालिका की सुरक्षा, कानून और मानवता के साथ सीधा खिलवाड़ है। परिवार ने दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और लापता नाबालिग को सुरक्षित दस्तयाब करने की मांग की है।
मामले के सामने आने के बाद पुलिस के आला अधिकारियों ने इसे गंभीर बताया है। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक नीतीश ठाकुर का कहना है कि प्रकरण की जांच एसडीओपी कटघोरा को सौंपी गई है और जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
लेकिन बड़ा सवाल अब भी जस का तस खड़ा है ?
अगर एक बकरे और कुछ पैसों में आरोपी छूट सकता है, तो नाबालिगों की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा ?
क्या दोषी वर्दीधारी बच जाएंगे या इस बार कार्रवाई कागजों से बाहर निकलकर जमीन पर भी दिखेगी ?
पूरा मामला अब पुलिस की जांच और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की असली परीक्षा बन चुका है ?

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