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डीईओ का कमाल ! शिकायतें फाइलों में दबी रहीं, मासूम बच्चों के सिर से छिन गई स्कूल-आंगनबाड़ी की छत

कोरबा। जिले में शिक्षा और महिला-बाल विकास व्यवस्था की हकीकत एक बार फिर उजागर हो गई है। ग्राम पंचायत करूमौहा के आश्रित ग्राम आछीमार में शासकीय प्राथमिक शाला भवन और आंगनबाड़ी भवन को बिना किसी वैधानिक अनुमति और शासकीय प्रक्रिया के जेसीबी मशीन से तोड़ दिया गया, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर मामले में महीनों बाद भी जिम्मेदार अधिकारियों ने कोई ठोस कार्रवाई करना जरूरी नहीं समझा।

इस पूरे प्रकरण को लेकर जनपद पंचायत बुन्देली, क्षेत्र क्रमांक 16 की निर्वाचित जनपद सदस्य श्रीमती मोहन बाई धीरहे ने दिनांक 16 मई 2025 को जिला प्रशासन को लिखित शिकायत सौंपी थी। शिकायत में स्पष्ट तौर पर बताया गया था कि प्राथमिक शाला और आंगनबाड़ी भवन पूरी तरह जर्जर नहीं थे। ग्राम पंचायत की बैठक में केवल छत हटाकर सामुदायिक भवन एवं अतिरिक्त कक्ष निर्माण का प्रस्ताव पारित किया गया था, न कि पूरे भवन को ध्वस्त करने का।

इसके बावजूद बिना किसी तकनीकी परीक्षण, बिना सक्षम स्वीकृति और बिना वैकल्पिक व्यवस्था किए दोनों शासकीय भवनों को भारी मशीन से तोड़ दिया गया। इससे न केवल शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुँचा, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और आंगनबाड़ी सेवाएं भी पूरी तरह प्रभावित हो गईं।

शिकायत के बाद भी चुप्पी, प्रशासन की संवेदनहीनता उजागर

शिकायत दिए जाने के सात महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद न तो किसी अधिकारी ने मौके का निरीक्षण किया, न ही सरपंच या अन्य जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई की गई। नतीजा यह हुआ कि आज आछीमार के छोटे-छोटे मासूम बच्चे स्कूल और आंगनबाड़ी की जगह कचरा शेड में बैठने को मजबूर हैं।

इस लापरवाही से नाराज जनपद सदस्य श्रीमती मोहन बाई धीरहे ने 26 दिसंबर 2025 को जिला कलेक्टर को पुनः अनुस्मारक पत्र भेजते हुए साफ चेतावनी दी कि यदि भविष्य में आंगनबाड़ी में पढ़ने या खेलने वाले किसी भी मासूम बच्चे के साथ कोई अप्रिय घटना घटती है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी ग्राम पंचायत के सरपंच और कार्रवाई न करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों की होगी।

शासकीय संपत्ति के दुरुपयोग के भी आरोप

शिकायत में यह भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं कि भवन तोड़ने के दौरान दरवाजे, खिड़कियां, लोहे की रॉड और अन्य उपयोगी सामग्री को सुरक्षित रखने के बजाय निजी लाभ के उद्देश्य से बेच दिया गया। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह सीधे तौर पर शासकीय संपत्ति के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार का मामला बनता है।

Gram Yatra पूछता है तीखे सवाल

• जब लिखित शिकायत पहले ही दी जा चुकी थी, तो जांच क्यों नहीं हुई ?
• मासूम बच्चों की सुरक्षा और पढ़ाई से जुड़े मामले को हल्के में क्यों लिया गया ?
• क्या डीईओ और संबंधित विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं होगी ?
• बिना अनुमति भवन तोड़ने वालों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं ?

यह मामला सिर्फ एक गांव का नहीं, बल्कि जिले की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। अगर स्कूल और आंगनबाड़ी जैसे संवेदनशील संस्थानों के साथ भी ऐसा रवैया अपनाया जाएगा, तो फिर बच्चों के सुरक्षित भविष्य की जिम्मेदारी कौन लेगा ? अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस गंभीर लापरवाही पर कब तक आंखें मूंदे रहता है या फिर दोषियों पर कोई ठोस कार्रवाई होती है।

 
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