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कांग्रेस नेताओं का अमानवीय चेहरा हुआ उजागर, यहां 100 रुपये की रैली में पहुंची महिला को मिली मौत ! अंतिम संस्कार तक मे नहीं पहुंचे कांग्रेसी

कोरबा। इन रोती-बिलखती तस्वीरों को गौर से देखिए। इसमें एक बुजुर्ग की मौत के साथ मानवता की चिता भी जलती दिखाई देगी। इस बुजुर्ग की खामोश लाश चीख-चीख कर न्याय का बखान कर रहे कांग्रेसियों की निर्लज सोच और अन्याय की दास्तान सुना रही है। महज 100 रूपए का लालच देकर कैसे उसे जिंदा रहते गरीबी की मजबूरी में झुलसने को लाचार किया गया। खुद को लोगों का मसीहा कहने वाली कांग्रेस प्रत्याशी ज्योत्सना महंत की बनावटी भीड़ में कैसे वह शामिल हुई, भूख और प्यास होकर छटपटाती चली और लड़खड़ाकर ऐसे गिरी, कि फिर सीधे उसकी अर्थी ही उठानी पड़ी। पेश है गरीबी हटाओ का नारा देकर गरीबों को हटाने की राजनीति करने वाले कांग्रेस की बेरहम नीति की यह सच्ची दास्तान।

आपको कांग्रेस की कोरबा लोकसभा प्रत्याशी ज्योत्सना महंत की नामांकन रैली तो याद ही होगी। लाव लश्कर के साथ पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष समेत बड़े नेताओं ने बड़े ही अभिमान के साथ यह रैली निकाली थी। शक्ति प्रदर्शन के अपने गर्वीले शौक की खातिर उन्होंने गांव कस्बों और मैली कुचैली बस्तियों के सैकड़ों गरीबों को अपनी रैली की शोभा बढ़ाते शामिल कर रखा था। इन्हीं में से एक नाम शहर के पथर्री पारा में रहने वालीं फूल बाई का भी था, जिसे कांग्रेसी नेत्री सीमा ने कांग्रेस प्रत्याशी ज्योत्सना महंत की नामांकन रैली में शामिल होने बुलाया था फूल बाई को रैली में भीड़ बढ़ाने के एवज में 100 रूपए का लालच भी दिया गया। जिंदगीभर गरीबी और मुफलिसी में जीने वाली फूल बाई ने 100 रूपए के लिए इस उम्र में भी कड़ी धूप बर्दाश्त करने तैयार हो गई। पर उसकी बुजुर्गवस्था ने साथ नहीं दिया। धूप और गर्मी से बेहाल बुजुर्ग को कमजोरी आ गई और वह रास्ते में ही गश खाकर गिर पड़ी। उसे गंभीर चोट भी आई पर संवेदना और मानवता अपने आलीशान महल की तिजोरी के भीतर ताले में बंद कर के आई कांग्रेसी रसूखदारों की भीड़ ने इस अबला बूढ़ी की चोट को अनदेखा कर आगे बढ़ गई। जब उसके परिवार को पता चला तो किसी तरह उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस बीच न तो कोई कांग्रेसी उसे देखने आया और न ही घर पहुंचकर उसकी खैरियत ही पूछी। आखिरकार कई दिनों तक अपनी गिरती सेहत से लड़ने के बाद बुजुर्ग फूलबाई ने आज दम तोड़ दिया। बताया जा रहा है कि फूलबाई को कांग्रेस नेत्री व उपाध्यक्ष सीमा और आशा बरेठ द्वारा कांग्रेस सांसद प्रत्याशी ज्योत्सना महंत की नामांकन रैली में 100 रूपये का लालच देकर ले जाया गया। रैली के दौरान भूख और प्यास से फूल बाई चक्कर खाकर गिर गई। जहां से उसे अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन उसके बाद कोई भी कांग्रेसी उस महिला की न तो सुध लेने पहुंचा और ना ही कोई आर्थिक सहायता ही दी गई।

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बेटे ने कहा, हमें ज्योत्सना महंत के 100 रुपए नहीं चाहिए, कम से कम एक बार अपना चेहरा ही दिखा देते

बेवक्त अपनी जान गंवा चुकी इस गरीब बुजुर्ग, जिसने जिंदगी भर अपनी गरीबी का मजाक बनते देखा ही, मौत आई तो वह भी तमाशा बनकर रह गई। बदकिस्मती तो ये कि उसे सिर्फ 100 रुपयों के लिए कुर्बान होना पड़ा और विडंबना तो देखिए कि वह सौ रुपए देने का वादा भी कांग्रेसियों ने पूरा नहीं किया, जो उसे अपने साथ ले गए थे। इस सच्ची कहानी में आपको कांग्रेस की वह सच्चाई नजर आएगी, जिसे जानकर दिल कहेगा कि काश हमने झूठ ही लिख दिया होता। इनमें एक बेटे की तड़प है, जिसने अपनी मां को खोने के गम के साथ वह पछतावा भी है कि काश उस दिन उसने उन्हे जाने रोक लिया होता। उसके बेटे रामविलास ने बताया कि 100 रूपए की खातिर मां चली गई और जिन लोगों ने उसे रैली की भीड़ में शामिल किया, उन्होंने कभी पलट कर यह जानने की जरूरत भी नहीं समझी, कि वह बुजुर्ग जो उनके साथ चली थी, जो गिर पड़ी थी, वह कैसी है, जिंदा है भी या नहीं। अरे 100 रूपए देना भारी पड़ रहा हो तो न देते, कम से कम इंसानियत के नाते एक बार घर आकर अपना मुंह ही दिखा देते, तो सोच लेते बड़े आदमी हैं, कम से कम हम गरीबों के लिए इतना समय निकाल लिया, वही बहुत है।

गरीब की चिता को रौंद कर जीतने की होड़, ये कैसी राजनीति : पार्षद चंद्रलोक सिंह

वार्ड पार्षद चंद्रलोक सिंह ने कहा कि यह बुजुर्ग महिला हमारे पड़ोस में ही रहती थी। उन्हें हम बचपन से देखते आए। घर घर काम करती थी और इसी तरह अपने बच्चों को पाल पोस बड़ा किया। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम रैलियों के लिए हम भी लोगों को लेकर जाते हैं पर उनकी सुरक्षा व भूख प्यास की भी जिम्मेदारी उठाते हैं। मानवता और संवेदना भी कोई चीज होती है। इन लोगों ने तो पलटकर देखना भी मुनासिब नहीं समझा। अभी तक भ्रष्टाचार और घोटालों की राजनीति के इर्द गिर्द घूम रहे कांग्रेसी अब गरीबों की आह लेकर जीत की राह तय करने पर आमादा दिखाई देते हैं। राजनीति का ये कैसा खेल है, जिसमें खुद को न्याय का पुजारी कहने वाले निर्दोष और गरीब की चिता को रौंद कर जीतने की होड़ में नजर आते हैं। ऐसा लगता है कि इस बुजुर्ग की मौत के साथ इनकी इंसानियत भी मर गई है।

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