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वाह भाई नगर निगम कोरबा की दास्तां छत्तीसगढ़ में कहीं नहीं, तो कोरबा में ही क्यों? ₹102.43 लाख के ‘ओपन टेंडर’ में पात्रता का जहरीला जाल—कौन है शर्तों का मास्टरमाइंड?

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राजधानी रायपुर सहित बड़े निकायों की निविदाओं में भी ऐसी काट-छांट नहीं—कोरबा में 31 मार्च 2023 की ‘लक्ष्मण रेखा’ खींचकर स्थानीय ठेकेदारों का रास्ता किसके इशारे पर बंद किया गया?

 

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पहले काम टुकड़ों में बांटे, फिर एकमुश्त करोड़ों के अनुभव की दीवार खड़ी कर दी! क्या किसी चहेती एजेंसी के दस्तावेजों का नाप लेकर तैयार की गई पात्रता?

 

ग्राम यात्रा की जांच निर्णायक मोड़ पर—दस्तावेजों की अगली कड़ी में नाम, पद और भूमिका के साथ होगा खुलासा

 

कोरबा।    क्या छत्तीसगढ़ में निविदा के नियम अलग-अलग शहरों के लिए अलग-अलग संविधान से चलते हैं? राजधानी रायपुर और प्रदेश के दूसरे नगरीय निकायों में बड़े मूल्य की मानव संसाधन निविदाएं अपेक्षाकृत सामान्य और स्पष्ट पात्रता पर निकाली जा सकती हैं, तो नगर पालिक निगम कोरबा के लगभग ₹102.43 लाख के श्रमिक-प्रदाय टेंडर में शर्तों की ऐसी कंटीली बाड़ क्यों खड़ी की गई कि स्थानीय ठेकेदार GeM के मैदान में उतरने से पहले ही बाहर हो जाएं?

 

यही वह सवाल है जिसने इस निविदा को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया से उठाकर संभावित टेंडर-सेटिंग की गंभीर जांच के केंद्र में ला खड़ा किया है।   उपलब्ध दस्तावेजों, तुलनात्मक निविदाओं और पूर्व कार्यादेशों के प्रारंभिक अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता है कि कोरबा नगर निगम की पात्रता शर्तें केवल कठोर नहीं, बल्कि असामान्य ढंग से चुनी गई हैं। हर शब्द, हर प्रतिशत और विशेष रूप से “31 मार्च 2023 के बाद” की समय-सीमा किसी साधारण कॉपी-पेस्ट से अधिक सुनियोजित दिखाई देती है।

अब असली सवाल यह नहीं कि शर्तें कठोर क्यों हैं। सवाल यह है—

 

इन शर्तों का वास्तुकार कौन है? किस अधिकारी ने यह गणित तैयार किया? किसने अनुमोदन दिया? और किस एजेंसी के उपलब्ध अनुभव प्रमाणपत्र इस पात्रता के ताले में चाबी की तरह फिट बैठते हैं?

राजधानी में नहीं, दूसरे निगमों में नहीं—फिर कोरबा में ही यह ‘विशेष प्रयोग’ क्यों?

प्राप्त प्रारंभिक तुलनात्मक जानकारी और उपलब्ध निविदा दस्तावेजों में राजधानी रायपुर तथा प्रदेश के अन्य नगरीय निकायों की इससे बड़े मूल्य की कई मानव संसाधन निविदाओं में कोरबा जैसी विशेष जोड़-तोड़ वाली समय-सीमा और परस्पर विरोधी पात्रता भाषा दिखाई नहीं देती। इस तुलना की अगली कड़ी में संबंधित Bid दस्तावेज भी सार्वजनिक किए जाएंगे।   नगर पालिका कटघोरा की अलग मानव संसाधन निविदा इसका निकटतम उदाहरण है। वहां GeM का प्रारूप अपेक्षाकृत सीधा है। MSE एवं स्टार्टअप के लिए अनुभव और टर्नओवर की छूट का उल्लेख स्पष्ट है। श्रमिकों की संख्या, श्रेणी, मजदूरी, EPF, ESIC और अवधि दस्तावेज में व्यवस्थित रूप से दर्ज है।

 

लेकिन कोरबा में उसी प्रकृति के कार्य पर अधिकारियों ने शर्तों का ऐसा ‘प्रयोगशाला संस्करण’ तैयार कर दिया जिसमें:

 

– पांच वित्तीय वर्ष लिखकर अवधि 31 मार्च 2023 के बाद सीमित कर दी गई;
– एक कार्य 80 प्रतिशत, दो कार्य 50 प्रतिशत या तीन कार्य 40 प्रतिशत का अनुभव मांगा गया;
– टर्नओवर की दो अलग-अलग व्याख्याएं रखी गईं;
– आयकर और GST दस्तावेजों के वित्तीय वर्ष तक आपस में नहीं मिले;
– एक तरफ चार माह और दूसरी तरफ 25 प्रतिशत अनुबंध विस्तार लिखा गया।

यदि राज्य के अन्य बड़े निकाय सरल और प्रतिस्पर्धी शर्तों पर काम करा सकते हैं, तो कोरबा नगर निगम को ही पात्रता की इतनी ऊंची दीवार बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
क्या कोरबा का जलप्रदाय श्रमिक किसी अत्याधुनिक परमाणु संयंत्र में काम करने वाला तकनीकी विशेषज्ञ है, जिसके लिए स्थानीय ठेकेदारों का पुराना अनुभव अचानक बेकार हो गया?
‘31 मार्च 2023’—एक तारीख नहीं, स्थानीय ठेकेदारों के लिए फांसी का फंदा?

 

निविदा में लिखा है कि समान प्रकृति का कार्य पिछले पांच वित्तीय वर्षों में किया गया हो। लेकिन अनुभव की अवधि 31 मार्च 2023 से Bid Submission Date के एक माह पूर्व तक निर्धारित कर दी गई।  सितंबर-अक्टूबर 2026 तक यह अवधि पांच वर्ष नहीं, लगभग साढ़े तीन वर्ष बैठती है।  तो फिर दस्तावेज में “पिछले पांच वित्तीय वर्ष” क्यों लिखा गया? यदि सचमुच पांच वर्षों का अनुभव चाहिए था तो 2021 अथवा उससे पहले की अवधि क्यों शामिल नहीं की गई? और यदि केवल 31 मार्च 2023 के बाद का अनुभव मान्य करना था तो पांच वर्ष का शब्द किसे भ्रमित करने के लिए रखा गया?   यहां 31 मार्च 2023 के शब्दों का विशेष महत्व है। इस तारीख से पहले नगर निगम में इसी प्रकार का कार्य करने वाले अनुभवी स्थानीय ठेकेदार एक झटके में पात्रता से बाहर हो सकते हैं। लेकिन 2023 के बाद बड़ी राशि का काम प्राप्त करने वाली कोई एजेंसी इस दरवाजे से सीधे अंदर पहुंच सकती है।

क्या यह कटऑफ तारीख कार्य की वास्तविक जरूरत से निकली है, या किसी विशेष एजेंसी के अनुभव प्रमाणपत्र की तारीख देखकर चुनी गई?  अब जांच इसी सवाल की गर्दन तक पहुंच रही है।   पहले काम टुकड़ों में बांटे, अब मांगा ₹81.94 लाख का एकमुश्त अनुभव!  नगर निगम कोरबा में पूर्व में श्रमिक-प्रदाय और समान प्रकृति के अनेक कार्य छोटे हिस्सों, सीमित अवधि और अलग-अलग कार्यादेशों में कराए जाने की जानकारी सामने आ रही है।

यानी निगम ने स्वयं स्थानीय ठेकेदारों को बड़े मूल्य का एकल कार्यादेश नहीं दिया। लेकिन अब उसी निगम ने नई निविदा में पात्रता रख दी—

– एक समान कार्य लगभग ₹81.94 लाख का;

– अथवा दो कार्य, प्रत्येक करीब ₹51.22 लाख का;

– अथवा तीन कार्य, प्रत्येक करीब ₹40.97 लाख का।

यह कैसी प्रशासनिक कलाबाजी है?

पहले काम को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटो, ताकि किसी स्थानीय ठेकेदार के पास बड़ा पूर्णता प्रमाणपत्र न बने। फिर नई निविदा में करोड़ों के एकमुश्त अनुभव की दीवार खड़ी कर दो। इसके बाद कहा जाए—“GeM ने ठेकेदार को अपात्र कर दिया!”   सच्चाई यह है कि GeM अपनी तरफ से ऐसी शर्त नहीं बनाता। पोर्टल वही लागू करता है जो खरीदार संस्था का अधिकारी उसमें दर्ज करता है। इसलिए यदि स्थानीय ठेकेदार सिस्टम से बाहर होंगे तो केवल GeM जिम्मेदार नहीं होगा; असली जवाबदेही उन अधिकारियों की होगी जिन्होंने यह पात्रता लिखी, जांची, अनुमोदित और अपलोड की।

GeM की बंदूक, अधिकारियों का कंधा—और निशाने पर स्थानीय ठेकेदार?
क्या कोरबा नगर निगम में GeM को पारदर्शिता का माध्यम नहीं, बल्कि तकनीकी अपात्रता की मशीन बनाया जा रहा है?

ऊपर से टेंडर “ओपन” दिखेगा। कोई भी एजेंसी आवेदन कर सकती है। लेकिन भीतर शर्तें ऐसी होंगी कि अधिकांश स्थानीय एजेंसियां दस्तावेज अपलोड करते ही बाहर हो जाएं। न किसी अधिकारी को सीधे इनकार करना पड़ेगा, न किसी फाइल पर “इसे अपात्र करो” लिखना होगा। सिस्टम पात्रता की पूर्वनिर्धारित शर्तों के आधार पर रास्ता बंद कर देगा।

फिर मैदान में वही एजेंसी बचेगी जिसके पास:

– 31 मार्च 2023 के बाद का बड़ा अनुभव;

– तय अनुपात का पूर्णता प्रमाणपत्र;

– करोड़ रुपये का टर्नओवर;

– अधिकारियों की बनाई प्रत्येक तकनीकी चाबी;  पहले से मौजूद होगी।

क्या यही इस शर्त-सज्जा का असली उद्देश्य है?  टेंडर से पहले पात्रता तय हुई या पात्र एजेंसी देखकर टेंडर लिखा गया?  सार्वजनिक निविदा में पहले कार्य की जरूरत निर्धारित होती है, फिर उसके अनुरूप निष्पक्ष पात्रता तय की जाती है। लेकिन कोरबा के दस्तावेज उल्टा सवाल खड़ा कर रहे हैं—क्या पहले किसी एजेंसी के प्रमाणपत्र देखे गए और फिर उन्हीं दस्तावेजों के अनुरूप पात्रता लिखी गई?

इसका उत्तर केवल भाषण से नहीं, इन रिकॉर्डों से मिलेगा:

– Bid Creation Log;

– User ID और समय-मुहर;

– Buyer Added Terms and Conditions का प्रारंभिक मसौदा;

– अंतिम संशोधन से पहले के Draft;

– फाइल की नोटशीट;

– पात्रता अनुमोदित करने वाले अधिकारियों के हस्ताक्षर;

– निविदा से पहले हुए पत्राचार;

– संभावित एजेंसियों द्वारा जमा पुराने अनुभव प्रमाणपत्र;

– निगम के पूर्व कार्यादेश और भुगतान रिकॉर्ड।

यदि शर्तों की राशि, तारीख और अनुभव किसी एक संभावित एजेंसी के दस्तावेजों से असामान्य रूप से मेल खाते पाए गए, तो यह केवल संयोग नहीं माना जा सकेगा।   ₹1 करोड़ टर्नओवर की दो जुबान—जिसे चाहो अंदर, जिसे चाहो बाहर?   एक स्थान पर तीन वर्षों का वार्षिक टर्नओवर ₹1 करोड़ लिखा है। दूसरी जगह तीन वित्तीय वर्षों में से किसी एक वर्ष का ₹1 करोड़ टर्नओवर पर्याप्त बताया गया है।  दोनों शर्तों का अर्थ जमीन-आसमान जितना अलग है।    अधिकारी चाहे तो कह सकता है कि प्रत्येक वर्ष ₹1 करोड़ चाहिए। दूसरा किसी पसंदीदा एजेंसी को किसी एक वर्ष का ₹1 करोड़ दिखाकर पात्र मान सकता है। ऐसी भाषा पारदर्शिता नहीं, बल्कि व्याख्या की खिड़की खोलती है।

क्या यही खिड़की बाद में किसी चहेती एजेंसी को अंदर लाने के लिए छोड़ी गई?
प्रतिस्पर्धा काटो, दर बढ़ाओ—सरकारी खजाना भुगतेगा?

निविदा में जितनी अधिक पात्र एजेंसियां होंगी, दरों में उतनी अधिक प्रतिस्पर्धा होगी। लेकिन यदि शर्तों के जाल से स्थानीय और छोटे सेवा प्रदाता बाहर कर दिए जाएं तो मैदान कुछ गिनी-चुनी एजेंसियों तक सीमित हो जाएगा।

इसका सीधा खतरा है:

– पात्र बोलीदाताओं की संख्या कम होगी;

– प्रतिस्पर्धी दर मिलने की संभावना घटेगी;

– चुनिंदा एजेंसी को ऊंची दर पर काम मिल सकता है;

– नगर निगम और जनता के धन पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा;

– ठेके का लाभ सीमित समूह तक सिमट सकता है।

इसीलिए पात्रता शर्तों की निष्पक्षता केवल ठेकेदारों का मामला नहीं है। यह सीधे सार्वजनिक धन और नगर निगम की जवाबदेही से जुड़ा विषय है।  दस्तावेज खुद बता रहे हैं—यह साधारण भूल नहीं!

यदि केवल एक तारीख गलत होती तो उसे टंकण त्रुटि कहा जा सकता था। लेकिन यहां:

– समय-सीमा असामान्य;
– अनुभव राशि भारी;
– टर्नओवर की भाषा दोहरी;
– वित्तीय वर्ष परस्पर विरोधी;
– अनुबंध विस्तार अलग-अलग;
– स्थानीय कार्यादेशों की पुरानी संरचना से पात्रता का टकराव;एक साथ दिखाई दे रहा है।

इतनी परतों वाली शर्तें अपने आप कंप्यूटर स्क्रीन पर नहीं उतरतीं। इन्हें किसी ने बनाया, किसी ने जांचा, किसी ने अनुमोदित किया और किसी ने GeM पर अपलोड किया।   इसलिए सवाल कठोर है—कोरबा नगर निगम में निविदा शर्तों की यह पटकथा लिखने वाला अधिकारी कौन है? उसके साथ कौन-कौन बैठा था? और किस एजेंसी को इन शर्तों से सबसे बड़ा लाभ मिलने वाला है?

‘मास्टरमाइंड’ तक पहुंच रही जांच—जल्द नाम और ओहदे के साथ खुलासा   ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क की दस्तावेजी जांच अब केवल निविदा की भाषा तक सीमित नहीं है। जांच उन फाइलों, अधिकारियों, शाखाओं और संभावित लाभार्थी एजेंसियों की कड़ी तक पहुंच चुकी है जहां से शर्तों की वास्तविक कहानी सामने आ सकती है।

किस अधिकारी ने पहला मसौदा तैयार किया?

किसने 31 मार्च 2023 की तारीख जोड़ी?

किसकी टिप्पणी पर अनुभव की राशि तय हुई?

किस स्तर पर स्थानीय ठेकेदारों के पूर्व कार्यादेशों को नजरअंदाज किया गया?

और किस संभावित एजेंसी के कागजात इस पात्रता से मेल खाते हैं?

इन प्रश्नों से जुड़े दस्तावेजों का सत्यापन जारी है। पर्याप्त पुष्टिकरण के बाद अगली कड़ी में संबंधित व्यक्तियों के नाम, पद, भूमिका और दस्तावेजी संबंध सार्वजनिक किए जाएंगे। जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं किया जा रहा, लेकिन अब यह मामला “किसी से गलती हो गई” वाली सफाई से बंद होने वाला नहीं है।

शासन की निगरानी सो रही है या उसे भी सब मालूम है?
यदि राजधानी रायपुर और अन्य बड़े नगर निगमों में इससे अधिक मूल्य की निविदाएं अपेक्षाकृत सामान्य शर्तों पर निकाली जा सकती हैं, तो नगरीय प्रशासन विभाग ने कोरबा की असामान्य पात्रता पर सवाल क्यों नहीं उठाया?
क्या विभाग के पास Buyer Added Terms की निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है?
क्या नगर निगम अपनी सुविधा से ऐसी कोई भी शर्त जोड़ सकता है जो प्रतिस्पर्धा को सीमित कर दे?
क्या शासन यह जांचेगा कि कितनी एजेंसियां इस शर्त के कारण बाहर हो रही हैं?
या फिर फाइल उसी अधिकारी के पास स्पष्टीकरण के लिए भेज दी जाएगी जिसकी भूमिका स्वयं जांच के दायरे में होनी चाहिए?

 

अब केवल जवाब नहीं, रिकॉर्ड चाहिए

नगर निगम कोरबा से निम्न रिकॉर्ड तत्काल सार्वजनिक किए जाने चाहिए:

1. Bid की मूल अनुमोदित नोटशीट।
2. पात्रता शर्तों का प्रारंभिक और अंतिम मसौदा।
3. 31 मार्च 2023 की तारीख चुनने का कानूनी एवं प्रशासनिक आधार।
4. Market Assessment और संभावित सेवा प्रदाताओं की संख्या।
5. पिछले पांच वर्षों के समान कार्यों के सभी कार्यादेश।
6. टुकड़ों में दिए गए कार्यों की एजेंसीवार सूची और भुगतान।
7. Bid Creation एवं Modification Audit Trail।
8. शर्त अपलोड करने वाले User ID और समय-मुहर।
9. सहभागी एवं तकनीकी रूप से पात्र-अपात्र एजेंसियों की सूची।
10. प्रत्येक अपात्रता का कारण।
11. निविदा से लाभ पाने वाली संभावित L-1 एजेंसी का अनुभव एवं टर्नओवर रिकॉर्ड।
12. शर्तों को अनुमोदित करने वाले सभी अधिकारियों के नाम और पद।

 

टेंडर खुला है या केवल दरवाजे पर ‘ओपन’ की तख्ती लगी है?

कोरबा नगर निगम का यह टेंडर उस दुकान जैसा दिखाई दे रहा है जिसके बाहर बड़े अक्षरों में “सभी के लिए खुला” लिखा हो, लेकिन भीतर जाने वाले दरवाजे की ऊंचाई, चौड़ाई और चाबी किसी एक व्यक्ति के हिसाब से बनाई गई हो।   स्थानीय ठेकेदार बाहर रहें, चुनिंदा एजेंसी पात्र बचे, प्रतिस्पर्धा सिकुड़े और फिर ऊंची दर को बाजार की मजबूरी बताया जाए—यदि जांच में यही क्रम सामने आया तो यह केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं, बल्कि सार्वजनिक निविदा की आत्मा से विश्वासघात होगा।

छत्तीसगढ़ के दूसरे नगर निगमों में नहीं, राजधानी में नहीं—तो कोरबा में ही नियमों का यह जहरीला प्रयोग क्यों?

उत्तर दस्तावेजों में छिपा है। जांच लगभग उस दरवाजे तक पहुंच चुकी है जिसके पीछे पात्रता की यह पटकथा लिखी गई। अब बारी नाम और ओहदे की है।

जल्द अगली कड़ी—“कौन है कोरबा के टेंडर नियमों का मास्टरमाइंड?”   नगर निगम कोरबा, राज्य शासन और नगरीय प्रशासन विभाग का आधिकारिक पक्ष अपेक्षित है। प्राप्त उत्तर को समान प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

— ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
संपादक – अब्दुल सुल्तान

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