शिवम फ्यूल्स की जमीन में ‘कागजी खेल’ का शक! 2,521 वर्गमीटर की अनुमति, डायवर्सन सिर्फ 1,904 वर्गमीटर—बाकी जमीन आई कहां से?

सूत्रों का गंभीर दावा—पेट्रोल पंप से लगी करीब 35–40 डिसमिल अतिरिक्त जमीन पर भी कथित कब्जा; SECL अधिग्रहण, वनभूमि और बड़े नाले की हकीकत खोल सकती है पूरी फाइल
पहले विकास अनुज्ञा, बाद में डायवर्सन! 2022 में पंप का आकार बढ़ाने की कोशिश पर भी उठे सवाल—दस्तावेजी प्रमाणों का संकलन जारी, जल्द बड़ा खुलासा
कोरबा/कुसमुंडा। ग्राम भैरोताल के खसरा नंबर 791/8 पर संचालित शिवम सर्विस स्टेशन की जमीन और अनुमति से जुड़े दस्तावेजों ने ऐसा कागजी धुआं खड़ा कर दिया है, जिसके पीछे भूमि के क्षेत्रफल, व्यावसायिक डायवर्सन, SECL अधिग्रहण, कथित वनभूमि, प्राकृतिक नाला और अतिरिक्त कब्जे का बड़ा सवाल छिपा दिखाई दे रहा है।
फाइलों में एक तरफ पेट्रोल पंप के लिए 0.252 हेक्टेयर अर्थात लगभग 2,521 वर्गमीटर भूमि दिखाई गई है, वहीं भू-अभिलेख के डायवर्सन आदेश में परिवर्तित क्षेत्रफल केवल 0.47 एकड़ अर्थात 1,904.46 वर्गमीटर दर्ज नजर आता है।
अब सीधा सवाल है—जब व्यावसायिक उपयोग के लिए परिवर्तित भूमि लगभग 1,904 वर्गमीटर थी, तो करीब 2,521 वर्गमीटर पर विकास अनुज्ञा और पेट्रोल पंप का ले-
आउट किस आधार पर तैयार हुआ?
लगभग 616 वर्गमीटर का अंतर किस मद की भूमि है?
क्या इस हिस्से का अलग डायवर्सन आदेश मौजूद है, या फिर कागजों की परतों के बीच जमीन का आकार चुपचाप बढ़ता चला गया?
यह मामूली जोड़-घटाव नहीं, बल्कि पेट्रोलियम जैसे अति संवेदनशील और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े व्यवसाय की वैधानिक नींव का सवाल है। 35–40 डिसमिल अतिरिक्त कब्जे का दावा—सीमांकन हुआ तो जमीन उगलेगी राज!स्थानीय सूत्रों ने इससे भी अधिक गंभीर दावा किया है। सूचना के अनुसार पेट्रोल पंप से लगी करीब 35 से 40 डिसमिल अतिरिक्त जमीन पर कथित रूप से कब्जा अथवा व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है।
यह दावा अभी राजस्व सीमांकन और मूल अभिलेखों से सत्यापित होना शेष है, लेकिन यदि यह सही निकला तो मामला केवल 616 वर्गमीटर के दस्तावेजी अंतर तक सीमित नहीं रहेगा।
इसके दायरे में यह जांच भी आएगी कि:
– अतिरिक्त जमीन किस खसरे का हिस्सा है?
– उसका वास्तविक स्वामी कौन है?
– क्या जमीन SECL की अर्जित भूमि में शामिल है?
– क्या वह नाला, शासकीय भूमि, वन मद या सार्वजनिक उपयोग की भूमि है?
– क्या अतिरिक्त हिस्से का व्यावसायिक डायवर्सन हुआ?
– क्या वहां पंप का प्रवेश मार्ग, पार्किंग, फिलिंग क्षेत्र, टैंक, कैनोपी अथवा अन्य निर्माण किया गया?
– क्या 2022 में मांगा गया बड़ा ले-आउट पहले ही जमीन पर उतार दिया गया?
संयुक्त डिजिटल सीमांकन हुआ तो कागज और जमीन के बीच छिपा पूरा अंतर सामने आ सकता है। पहले विकास अनुज्ञा, फिर डायवर्सन—क्या नियमों को उल्टा पढ़ा गया?
दस्तावेज बताते हैं कि नगर तथा ग्राम निवेश विभाग की विकास अनुज्ञा 3 जून 2019 को जारी हुई, जबकि भूमि को पेट्रोल पंप जैसे व्यावसायिक प्रयोजन के लिए परिवर्तित करने वाला राजस्व आदेश 24 जुलाई 2019 का है।
अर्थात विकास अनुज्ञा पहले और अंतिम डायवर्सन आदेश बाद में!
विकास अनुज्ञा की शर्तों में स्वयं लिखा गया था कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 172 के अंतर्गत भूमि का व्यपवर्तन कराया जाना आवश्यक होगा। इसके बाद भी डायवर्सन आदेश से पहले विकास अनुज्ञा जारी करने की ऐसी क्या जल्दी थी?
क्या उस समय तक निर्माण शुरू हो चुका था?
भूमिगत टैंक डाल दिए गए थे?
जमीन समतल कर दी गई थी?
विभागों को केवल पहले से तैयार कारोबार पर कागजी मुहर लगाने के लिए बैठाया गया था?
इन सवालों का जवाब निर्माण प्रारंभ होने की वास्तविक तारीख, मौके की पुरानी तस्वीरों, नगर निगम की भवन अनुमति और HPCL/PESO निरीक्षण रिकॉर्ड से निकलेगा।
SECL का पत्र खसरा-विशिष्ट प्रमाण नहीं—“ग्राम अर्जित नहीं” कहकर फाइल क्यों बंद कर दी गई?
SECL कुसमुंडा क्षेत्र के पत्र दिनांक 25 मई 2019 में लिखा गया कि ग्राम भैरोताल SECL के अंतर्गत अर्जित ग्राम नहीं है। लेकिन इस पत्र में खसरा नंबर 791/8 के अधिग्रहण इतिहास, पुराने खसरा नंबर, अवार्ड, कब्जा रजिस्टर अथवा मुआवजा रिकॉर्ड का स्पष्ट विवरण नहीं है। यही इस पत्र की सबसे कमजोर कड़ी है।
प्रश्न यह है कि क्या SECL ने केवल ग्राम का नाम देखकर जवाब दिया, या वास्तव में:
– Coal Bearing Areas Act की अधिसूचनाएं जांचीं;
– अर्जन अवार्ड देखा;
– पजेशन रजिस्टर मिलाया;
– पुराने और नए खसरा नंबरों की कड़ी जोड़ी;
– मुआवजा भुगतान रिकॉर्ड की जांच की?
सूत्रों की सूचना है कि संबंधित क्षेत्र में SECL की अर्जित भूमि होने का दावा मौजूद है। ऐसे में सामान्य पत्र के भरोसे जांच बंद नहीं की जा सकती। खसरा-विशिष्ट प्रमाण प्रस्तुत करना SECL की जिम्मेदारी है। यदि अधिग्रहण रिकॉर्ड में जमीन SECL की निकली, तो निजी भूमि स्वामी मद में नाम कैसे दर्ज हुआ, डायवर्सन कैसे हुआ और पेट्रोल पंप का NOC किस आधार पर जारी किया गया—ये सवाल कई विभागों के दरवाजे तक जाएंगे।
मिसल रिकॉर्ड में वनभूमि होने का दावा—वन विभाग की NOC भी शर्तों के घेरे में
वन विभाग के 9 जुलाई 2019 के पत्र में भूमि को राजस्व भूमि बताया गया। पत्र में यह भी कहा गया कि भूमि आरक्षित अथवा संरक्षित वन और बड़े-छोटे झाड़ के जंगल में दर्ज नहीं है। लेकिन इसी पत्र में एक महत्वपूर्ण शर्त दर्ज है—भूमि वर्ष 1980 से पूर्व वनभूमि नहीं होने की स्थिति में विभाग को आपत्ति नहीं है।
अब सूत्र दावा कर रहे हैं कि पुराने मिसल रिकॉर्ड में भूमि वनभूमि दर्ज हो सकती है। यदि मूल मिसल बंदोबस्त, पुराने खसरे, वाजिब-उल-अर्ज, निस्तार पत्रक अथवा वन नक्शे में भूमि का वन चरित्र सामने आता है, तो वर्तमान राजस्व प्रविष्टि के आधार पर जारी NOC खुद जांच के कटघरे में खड़ी हो जाएगी।
क्या वन विभाग ने केवल वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड देखा?
क्या 1980 से पहले का मूल रिकॉर्ड जांचा गया?
क्या राजस्व और वन नक्शों का संयुक्त मिलान हुआ?
किस दस्तावेज के आधार पर यह घोषित किया गया कि जमीन वनभूमि नहीं है?
इसका उत्तर मूल अभिलेख देंगे, विभागीय बयान नहीं।
पंप से लगा बड़ा नाला—फिर प्रतिवेदन में नाला गायब कैसे?
स्थानीय जानकारी के अनुसार पेट्रोल पंप की जमीन से एक बड़ा प्राकृतिक नाला लगा हुआ है। इसके विपरीत राजस्व जांच प्रतिवेदन में भूमि को नदी, तालाब, नाला, झील और जलभराव क्षेत्र से बाहर बताया गया। नगर तथा ग्राम निवेश की विकास अनुज्ञा में प्राकृतिक जल प्रवाह सुरक्षित रखने और नाली की चौड़ाई बनाए रखने की शर्त भी दर्ज है।
इससे सवाल और गहरा होता है कि:
– क्या नक्शे में प्राकृतिक नाले की वास्तविक चौड़ाई दिखाई गई?
– नाला किस खसरे में दर्ज है?
– क्या नाले के किनारे की जमीन को पेट्रोल पंप परिसर में मिला लिया गया?
– क्या पहुंच मार्ग या पुलिया बनाने के लिए नाले पर भराव किया गया?
– बरसाती पानी और पेट्रोलियम रिसाव की निकासी कहां होती है?
– क्या जल संसाधन विभाग से अनुमति ली गई?
पेट्रोल पंप और बड़े नाले का संबंध केवल जमीन का विवाद नहीं, बल्कि जल प्रदूषण, आग, बाढ़ और सार्वजनिक सुरक्षा का भी गंभीर विषय है।
2022 में 30×30 से 30×45 मीटर करने की मांग—क्या अतिरिक्त जमीन पहले ही कब्जे में थी?
HPCL के 14 फरवरी 2022 के पत्र से सामने आता है कि मूल अनुमोदित ले-आउट लगभग 30×30 मीटर था। बाद में बिक्री और आवागमन बढ़ने का हवाला देकर इसे दोनों ओर बढ़ाकर 30×45 मीटर करने की मांग की गई। नगर तथा ग्राम निवेश के क्षेत्रीय कार्यालय ने 31 मार्च 2022 को स्पष्ट किया कि पहले जारी विकास अनुज्ञा में संशोधन करने की शक्ति उसके पास नहीं है।
इसके बावजूद यदि पंप वर्तमान में बढ़े हुए क्षेत्र में संचालित हो रहा है, तो प्रश्न उठता है:
– संशोधित ले-आउट किस सक्षम अधिकारी ने मंजूर किया?
– अतिरिक्त भूमि का स्वामित्व और डायवर्सन कहां है?
– क्या कलेक्टर का संशोधित NOC जारी हुआ?
– क्या PESO ने बदले हुए परिसर और नक्शे को स्वीकृति दी?
– क्या 35–40 डिसमिल कथित अतिरिक्त कब्जे का संबंध इसी विस्तार से है?
यदि संशोधित स्वीकृति के बिना वास्तविक परिसर बढ़ाया गया है, तो यह सामान्य निर्माण उल्लंघन नहीं बल्कि पेट्रोलियम सुरक्षा लाइसेंस की शर्तों से जुड़ा गंभीर मामला होगा। कलेक्टर की NOC संचालन का अंतिम लाइसेंस नहीं 12 सितंबर 2019 को जारी कलेक्टर की NOC केवल Petroleum Rules के अंतर्गत जिला स्तर की अनापत्ति है। इससे अपने-आप पेट्रोल पंप चलाने का स्थायी अधिकार पैदा नहीं होता।
वर्तमान संचालन के लिए PESO का वैध Form XIV लाइसेंस, अनुमोदित साइट प्लान, टैंक परीक्षण प्रमाणपत्र, सुरक्षा प्रमाणपत्र, अग्निशमन NOC, भवन अनुमति और संबंधित विभागों की वैध स्वीकृतियां आवश्यक हैं।
यदि जमीन पर उपयोग का अधिकार समाप्त हो जाए, स्वामित्व गलत निकले, अतिरिक्त भूमि अनधिकृत रूप से इस्तेमाल हो अथवा अनुमोदित नक्शे से बाहर निर्माण मिले, तो NOC और पेट्रोलियम लाइसेंस दोनों पर कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है। इन अभिलेखों को सार्वजनिक करे प्रशासन
मामले की निष्पक्षता के लिए निम्न दस्तावेज तत्काल सार्वजनिक किए जाने चाहिए:
1. खसरा 791/8 की मूल मिसल बंदोबस्त और वर्षवार B-1;
2. पुराने एवं वर्तमान राजस्व नक्शे;
3. SECL की अधिग्रहण अधिसूचना, अवार्ड और पजेशन रजिस्टर;
4. वन विभाग का वर्ष 1980 से पूर्व का रिकॉर्ड;
5. मूल एवं संशोधित डायवर्सन आदेश;
6. 30×30 और 30×45 मीटर वाले दोनों ले-आउट;
7. वर्तमान PESO Form XIV लाइसेंस;
8. PESO द्वारा अनुमोदित साइट प्लान;
9. नाले का खसरा, चौड़ाई और संयुक्त सीमांकन रिपोर्ट;
10. अतिरिक्त 35–40 डिसमिल जमीन का स्वामित्व रिकॉर्ड;
11. नगर निगम की भवन अनुमति और पूर्णता प्रमाणपत्र;
12. वर्तमान संचालक और वास्तविक लाभार्थी का विवरण।
कागजों का पेट्रोल पंप या नियमों के ऊपर खड़ा कारोबार?
दस्तावेजों की परतें बताती हैं कि यह मामला केवल पेट्रोल बेचने का नहीं, बल्कि जमीन के चरित्र, क्षेत्रफल और सरकारी अनुमतियों की विश्वसनीयता का है।
2,521 वर्गमीटर की विकास अनुज्ञा और लगभग 1,904 वर्गमीटर के डायवर्सन के बीच का अंतर कौन निगल गया?
35–40 डिसमिल अतिरिक्त जमीन किसकी है?
यदि भूमि SECL के अधिग्रहण या पुराने वन रिकॉर्ड में दर्ज निकली तो निजी नामांतरण की सीढ़ी किसने तैयार की?
बड़े नाले को कागजी जांच में किसने गायब कर दिया?
अब जरूरत विभागीय लीपापोती की नहीं, बल्कि कलेक्टर, राजस्व, वन विभाग, SECL, नगर तथा ग्राम निवेश, नगर निगम, HPCL, PESO और जल संसाधन विभाग की संयुक्त जांच की है। जांच स्थल के डिजिटल सीमांकन से शुरू होकर मूल रिकॉर्ड की फोरेंसिक तुलना तक पहुंचनी चाहिए। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क संबंधित दस्तावेजों का संकलन कर रहा है। खसरा, मिसल, SECL अधिग्रहण रिकॉर्ड, नाले की वास्तविक सीमा और कथित अतिरिक्त कब्जे से जुड़े दस्तावेजी प्रमाणों के साथ—जल्द बड़ा खुलासा।
नोट: अतिरिक्त कब्जे, SECL अर्जित भूमि और पुराने वन रिकॉर्ड से संबंधित बिंदु फिलहाल सूत्रों से प्राप्त दावे हैं। अंतिम निष्कर्ष सक्षम प्राधिकारी द्वारा मूल अभिलेखों के परीक्षण और संयुक्त सीमांकन के बाद ही निकलेगा। संबंधित पक्ष अपना दस्तावेजी पक्ष उपलब्ध करा सकते हैं; उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क, कोरबा
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