ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क विशेष खोजी रिपोर्ट, कोरबा की धरती से उठता बड़ा सवाल : CSR के सैकड़ों करोड़ गए कहाँ? खनिज संपदा से मालामाल कंपनियाँ, लेकिन प्रभावित गांव अब भी बुनियादी सुविधाओं को तरस रहे

विशेष संवाददाता | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क
कोरबा। छत्तीसगढ़ की धरती ने देश को कोयला, बॉक्साइट, एल्युमिनियम और बिजली दी। कोरबा, कवर्धा, रायगढ़, जांजगीर-चांपा और सरगुजा जैसे जिलों ने उद्योगों की कीमत अपने जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण से चुकाई। बदले में कंपनियों ने सामाजिक विकास का वादा किया था। इसी उद्देश्य से CSR (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) कानून बनाया गया, ताकि उद्योगों का लाभ स्थानीय जनता तक पहुंचे।
लेकिन अब सामने आए दस्तावेजों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—
कोरबा ने दिया खनिज, जनता को क्या मिला?
कोरबा जिला आज देश के सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक और ऊर्जा केंद्रों में गिना जाता है।
- यहीं BALCO की विशाल परियोजनाएँ संचालित हैं।
- यहीं की धरती से निकले संसाधनों ने अरबों-खरबों का कारोबार खड़ा किया।
लेकिन दूसरी तरफ़:
- कई गांवों में आज भी पेयजल संकट है।
- विस्थापित परिवार रोजगार के लिए भटक रहे हैं।
- स्वास्थ्य सेवाएँ सीमित हैं।
- पर्यावरणीय प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है।
- ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कें और बुनियादी ढांचा अपेक्षित स्तर तक विकसित नहीं हो पाया।
ऐसे में जब CSR पर करोड़ों रुपये खर्च होने के दावे किए जाते हैं, तो आम जनता पूछ रही है—
“हमारे हिस्से का विकास आखिर कहाँ हुआ?”
BALCO मेडिकल सेंटर को करोड़ों, गांवों को कितना?
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार BALCO ने तीन वर्षों में लगभग ₹149 करोड़ से अधिक राशि BALCO Medical Centre को हस्तांतरित की।
- 2019-20 : ₹77.53 करोड़
- 2020-21 : ₹44.05 करोड़
- 2021-22 : ₹27.54 करोड़
वहीं दूसरी ओर, स्थानीय सामाजिक विकास कार्यक्रमों पर अपेक्षाकृत कम खर्च दिखाई देता है।
कोरबा के सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि इतनी बड़ी राशि सीधे प्रभावित गांवों के स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और पेयजल योजनाओं पर लगाई जाती, तो आज तस्वीर अलग हो सकती थी।
CSR या कॉर्पोरेट चक्र?
दस्तावेजों में दावा किया गया है कि BALCO Medical Centre का संचालन Vedanta Medical Research Foundation द्वारा किया जाता है।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—
- क्या CSR फंड का उपयोग ऐसी संस्थाओं में किया गया जो सीधे या परोक्ष रूप से उसी कॉर्पोरेट समूह से जुड़ी हैं?
- यदि ऐसा है तो क्या पर्याप्त पारदर्शिता बरती गई?
- क्या जनता को इसकी पूरी जानकारी दी गई?
- क्या स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट कराया गया?
यही प्रश्न अब जनचर्चा का विषय बनते जा रहे हैं।
कोरबा से रायपुर तक : CSR आंकड़ों में अंतर के आरोप
दस्तावेजों में दावा किया गया है कि:
- CSR.GOV.IN
- MCA CSR-2 रिपोर्ट
- कंपनी की वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट
तीनों में कई जगह खर्च के आंकड़े अलग-अलग दिखाई देते हैं।
यदि यह अंतर वास्तविक है, तो यह केवल एक कंपनी का नहीं बल्कि पूरे CSR निगरानी तंत्र का विषय बन जाता है।
“जब रिकॉर्ड अलग-अलग हैं तो सच्चाई कौन बताएगा?”
खनन प्रभावित क्षेत्रों की सबसे बड़ी पीड़ा
कोरबा, पाली, पोड़ी-उपरोड़ा, करतला, दीपका, गेवरा और आसपास के कई क्षेत्रों में ग्रामीण वर्षों से एक जैसी शिकायतें करते आए हैं—
- रोजगार नहीं
- प्रदूषण बढ़ता जा रहा
- खेती प्रभावित
- जलस्रोत दूषित
- युवाओं का पलायन
- स्वास्थ्य समस्याएँ
जबकि दूसरी ओर CSR खर्च के बड़े-बड़े दावे सामने आते हैं। यही विरोधाभास पूरे विवाद का मूल है।
छत्तीसगढ़ के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?
यह मामला केवल BALCO या Vedanta तक सीमित नहीं है। यह सवाल पूरे छत्तीसगढ़ का है।
- राज्य देश को खनिज देता है।
- स्थानीय लोग पर्यावरणीय कीमत चुकाते हैं।
- उद्योगों को भारी आर्थिक लाभ मिलता है।
- CSR का उद्देश्य इसी असंतुलन को कम करना है।
यदि CSR का लाभ वास्तविक हितग्राहियों तक नहीं पहुँचता, तो सबसे अधिक नुकसान उन ग्रामीणों को होता है जिनके नाम पर यह व्यवस्था बनाई गई।
जनता जानना चाहती है
- पिछले दस वर्षों में BALCO ने कुल कितना CSR खर्च किया?
- उस राशि का कितना हिस्सा सीधे कोरबा जिले के गांवों में खर्च हुआ?
- कितनी राशि समूह-संबद्ध संस्थाओं को दी गई?
- कितने गांवों में स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट हुआ?
- विस्थापित और प्रभावित परिवारों को वास्तविक लाभ कितना मिला?
- CSR.GOV.IN, MCA और ऑडिट रिपोर्टों के आंकड़ों में अंतर क्यों दिखाई देता है?
अब जरूरत है जन-जांच की
- ✔ कोरबा जिले में ग्राम स्तर पर सामाजिक ऑडिट की
- ✔ CSR परियोजनाओं के भौतिक सत्यापन की
- ✔ विधानसभा और संसद स्तर पर चर्चा की
- ✔ CAG जैसी स्वतंत्र एजेंसी से समीक्षा की
- ✔ प्रभावित ग्राम सभाओं को जानकारी देने की
ग्राम यात्रा का संपादकीय मत
कोरबा और छत्तीसगढ़ की जनता किसी कंपनी की विरोधी नहीं है। उद्योग विकास का आधार हैं। लेकिन विकास तभी सार्थक माना जाएगा जब उसका लाभ सबसे पहले उस गांव तक पहुंचे जिसने अपनी जमीन, जंगल और भविष्य दांव पर लगाया है।
आज आवश्यकता आरोप और प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि पारदर्शिता की है।
“खनिज हमारी धरती से निकला, मुनाफा कंपनियों को मिला, लेकिन विकास आखिर किसे मिला?”
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क
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