विशेष खोजी रिपोर्ट : क्या खनन के लिए बदली गई अभयारण्य की सीमा? ओडिशा में वन्यजीव संरक्षण पर उठे गंभीर सवाल

भुवनेश्वर/नई दिल्ली। ओडिशा में बॉक्साइट खनन को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। एक खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि राज्य सरकार ने कार्लापाट वन्यजीव अभयारण्य (Karlapat Wildlife Sanctuary) की सीमाओं में बदलाव कर ऐसे क्षेत्रों को संरक्षित दायरे से बाहर कर दिया, जिनके नीचे बड़े बॉक्साइट भंडार मौजूद हैं। यदि यह दावा सही साबित होता है, तो यह वन्यजीव संरक्षण, पर्यावरणीय शासन और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन से जुड़े गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
खनन के लिए खुला रास्ता?
रिपोर्ट के अनुसार, अभयारण्य की सीमा के पुनर्निर्धारण (Rationalisation) के बाद कम से कम एक प्रमुख बॉक्साइट ब्लॉक—कार्लापाट—खनन गतिविधियों के लिए अधिक सुलभ हो गया। साथ ही किशनमाली क्षेत्र भी अभयारण्य की सीमा से अपेक्षाकृत दूर दिखाई देने लगा। रिपोर्ट का दावा है कि यह बदलाव भविष्य की खनन परियोजनाओं को लाभ पहुंचा सकता है।
सरकार ने क्या कहा?
दस्तावेजों के अनुसार, राज्य वन विभाग ने सीमा परिवर्तन के पक्ष में यह तर्क दिया कि हटाई जाने वाली भूमि “क्षतिग्रस्त (Degraded)” थी और उस पर मानव एवं पशु दबाव था।
हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि विचार-विमर्श की पूरी प्रक्रिया में बॉक्साइट भंडार ही प्रमुख मुद्दा बने रहे और खनन हितों को प्राथमिकता मिलती दिखाई दी।
राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की भूमिका पर सवाल
रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) की स्थायी समिति ने प्रस्ताव पर केवल विचार ही नहीं किया, बल्कि भविष्य की खनन संभावनाओं और परिवहन जरूरतों को ध्यान में रखते हुए संशोधित प्रस्ताव तैयार करने की सलाह भी दी।
इससे यह बहस तेज हो गई है कि क्या संरक्षण संबंधी संस्थाएं अपने मूल उद्देश्य से भटक रही हैं।
पर्यावरणीय प्रभाव का मुद्दा
कार्लापाट क्षेत्र एशियाई हाथियों के महत्वपूर्ण आवागमन गलियारे (Elephant Corridor) के निकट स्थित है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संरक्षित क्षेत्रों की सीमाएं खनन गतिविधियों के अनुरूप बदली जाती हैं, तो इसका दीर्घकालिक असर जैव विविधता और वन्यजीव आवासों पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि हटाए गए कुछ क्षेत्रों की उपग्रह तस्वीरें उन्हें घने वन क्षेत्र के रूप में दर्शाती हैं।
प्रक्रिया पर उठे सवाल
रिपोर्ट के मुताबिक, जिन क्षेत्रों को अभयारण्य से बाहर किया गया, उनके संबंध में आवश्यक निरीक्षण रिपोर्ट और तथ्यों की पारदर्शिता को लेकर भी प्रश्न उठाए गए हैं।
हालांकि संबंधित विभागों ने रिपोर्ट प्रकाशित होने तक इन आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं दी थी।
राजनीतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि
ओडिशा देश के कुल बॉक्साइट भंडार का बड़ा हिस्सा रखता है और राज्य लंबे समय से खनन एवं एल्युमिनियम उद्योग का केंद्र रहा है।
ऐसे में पर्यावरण संरक्षण और औद्योगिक विकास के बीच संतुलन को लेकर यह मामला राष्ट्रीय महत्व का बन गया है।
बड़ा सवाल
यदि किसी संरक्षित वन क्षेत्र की सीमाएं प्राकृतिक संरक्षण की आवश्यकता के बजाय खनन हितों को ध्यान में रखकर बदली गईं, तो यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि पर्यावरणीय शासन की विश्वसनीयता से जुड़ा मुद्दा बन जाता है।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि केंद्र और राज्य सरकारें इन आरोपों पर क्या जवाब देती हैं और क्या किसी स्वतंत्र जांच की मांग आगे बढ़ती है।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क
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