‘कचरा भूमि’ पर ट्रांसपोर्ट नगर बसाने की तैयारी का बड़ा खेल ! हाईकोर्ट आदेश के बावजूद निगम सक्रिय, नेताओं की जमीन को लाभ पहुंचाने की आशंका, फिर कोर्ट पहुंचेगा मामला…

कोरबा। ग्राम बरबसपुर स्थित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management) हेतु आबंटित भूमि के आसपास नवीन ट्रांसपोर्ट नगर बसाने की तैयारी को लेकर कोरबा की राजनीति, प्रशासन और पर्यावरण तीनों के बीच बड़ा टकराव खड़ा हो गया है। नगर पालिक निगम कोरबा द्वारा इस विषय को सामान्य सभा में प्रस्तुत किए जाने और आगे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू किए जाने के बाद यह मामला एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। खास बात यह है कि यह वही भूमि है, जिसे लेकर पहले भी गंभीर विवाद हुआ था और मामला माननीय उच्च न्यायालय तक पहुंच चुका है।
नगर निगम आयुक्त द्वारा जारी आधिकारिक पत्र में यह स्वीकार किया गया है कि नवीन ट्रांसपोर्ट नगर परियोजना से संबंधित विषय सामान्य सभा में प्रस्तुत किया गया है, हालांकि निगम ने यह भी स्पष्ट किया है कि अभी किसी प्रकार का अंतिम निर्णय, भूमि उपयोग परिवर्तन या निर्माण कार्य स्वीकृत नहीं किया गया है। निगम ने यह भी कहा है कि माननीय उच्च न्यायालय, छत्तीसगढ़ द्वारा पारित आदेश दिनांक 03.02.2023 (WPC No. 615/2023) का पालन करना अनिवार्य है तथा Central Pollution Control Board (CPCB) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप ही कोई निर्णय लिया जाएगा। ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या नवीन ट्रांसपोर्ट नगर बसाने की योजना सिर्फ वाहवाही लूटने का माध्यम है ?

गौरतलब है कि ग्राम बरबसपुर स्थित खसरा क्रमांक 359 की लगभग 72 एकड़ भूमि वर्ष 2016 में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन संयंत्र की स्थापना हेतु आबंटित की गई थी। इस भूमि का उद्देश्य शहर के कचरा निस्तारण, पर्यावरण संरक्षण और जनस्वास्थ्य की रक्षा करना था। वर्ष 2021 में इसी भूमि के 33.65 एकड़ हिस्से में ट्रांसपोर्ट नगर एवं व्यावसायिक गतिविधियों के विकास की अनुमति दी गई थी, लेकिन Solid Waste Management Rules, 2016 तथा राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) के स्पष्ट नियमों के अनुसार ठोस अपशिष्ट प्रबंधन संयंत्र के 500 मीटर के दायरे में किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि प्रतिबंधित होने के कारण उक्त योजना को निरस्त कर दिया गया था।
इस पूरे मामले को लेकर ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ के संपादक एवं कोरबा निवासी अब्दुल सुल्तान द्वारा माननीय उच्च न्यायालय में Writ Petition (Civil) No. 615 of 2023 दायर की गई थी। दिनांक 03 फरवरी 2023 को पारित आदेश में माननीय उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि भविष्य में किसी भी परियोजना को स्वीकृति देते समय CPCB के दिशा-निर्देशों एवं ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों का कड़ाई से पालन अनिवार्य होगा। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी कर कोई भी निर्णय नहीं लिया जा सकता।
हालांकि अब पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिस भूमि को ट्रांसपोर्ट नगर के लिए चिन्हित किए जाने की बात कही जा रही है, वह वस्तुतः वही शासकीय भूमि है जहां वर्तमान में कचरा डंपिंग का कार्य किया जा रहा है। सूत्रों का दावा है कि इस भूमि से लगी कोई अन्य स्वतंत्र रिक्त भूमि उपलब्ध नहीं है और सीमांकन एवं कागजी प्रक्रिया के माध्यम से उसी भूमि के एक हिस्से को अलग दर्शाकर ट्रांसपोर्ट नगर स्थापित करने की तैयारी की जा रही है। यदि ऐसा होता है, तो यह Solid Waste Management Rules, 2016 एवं CPCB द्वारा निर्धारित 500 मीटर की अनिवार्य दूरी के नियमों का प्रत्यक्ष उल्लंघन होगा।
इस पूरे घटनाक्रम में अब राजनीतिक एंगल भी खुलकर सामने आने लगा है। स्थानीय सूत्रों का दावा है कि जिस स्थान पर ट्रांसपोर्ट नगर बसाने की तैयारी की जा रही है, उससे लगी भूमि कई प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तियों एवं उनके परिजनों के नाम पर पंजीकृत है। ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि ट्रांसपोर्ट नगर बसने से उक्त निजी भूमि की व्यावसायिक कीमत में कई गुना वृद्धि होगी, जिससे संबंधित व्यक्तियों को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ मिलेगा।
यह भी उल्लेखनीय है कि नगर पालिक निगम कोरबा में पिछले लगभग 10 वर्षों तक कांग्रेस का शासन रहा और एक वर्ष पूर्व ही भारतीय जनता पार्टी ने नगर सरकार की कमान संभाली है। बावजूद इसके, निगम के कुछ अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कुछ अधिकारी अभी भी अपने पूर्व राजनीतिक आकाओं को उपकृत करने की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाए हैं और इसी कारण कागजों में हेरफेर कर उसी विवादित भूमि को उपयुक्त दर्शाने का प्रयास किया जा रहा है, जो पूर्व में पर्यावरणीय नियमों के कारण निरस्त की जा चुकी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन क्षेत्र के भीतर अथवा उसके निकट व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति दी जाती है, तो इससे न केवल पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ेगा, बल्कि आसपास रहने वाले नागरिकों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव पड़ेगा। कचरा प्रबंधन क्षेत्र के आसपास व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ने से संक्रमण, प्रदूषण और अन्य स्वास्थ्य संबंधी खतरे उत्पन्न होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
इस पूरे मामले को लेकर ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ के संपादक अब्दुल सुल्तान ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ परिवार शहर के विकास का विरोधी नहीं है, लेकिन विकास के नाम पर शहरवासियों के स्वास्थ्य और पर्यावरण से खिलवाड़ किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यदि नियमों को दरकिनार कर इस परियोजना को आगे बढ़ाया गया, तो वे पुनः माननीय उच्च न्यायालय अथवा राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण की शरण लेंगे और जनहित में कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ परिवार जनहित में सच के साथ खड़ा है और रहेगा। शहर के विकास में बाधक बने बिना, शहरवासियों को बीमारी और प्रदूषण के खतरे में नहीं धकेला जा सकता। यदि इसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़े, तो भी ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ परिवार पीछे नहीं हटेगा।
फिलहाल नगर निगम की सफाई और जमीनी हकीकत को लेकर उठ रहे सवालों के बीच यह मामला एक बार फिर प्रशासन, राजनीति और न्यायिक प्रक्रिया के केंद्र में आ गया है। आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक गंभीर रूप ले सकता है और इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि यह मामला एक बार फिर न्यायालय के दरवाजे तक पहुंचेगा।
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