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वाह रे अधिकारी ! SDO की जांच में पुष्टि के बाद भी FIR से कांप रहे हाथ, 15 दिन में मकान ठीक करने की चेतावनी… मुश्किल में कथित पत्रकार मयानाथ मौर्य

कोरबा। शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के गंभीर आरोपों के बावजूद सख्त कार्रवाई की जगह “मोहलत” देने का मामला सामने आया है। हसदेव बरॉज जल प्रबंध संभाग, रामपुर/कोरबा के शासकीय आवास एच-05 में कथित तौर पर तोड़फोड़ और नुकसान पहुंचाने के आरोप में एक कथित पत्रकार को नोटिस जारी किया गया है। लेकिन बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब विभागीय जांच में नुकसान की पुष्टि हो चुकी है तो अब तक सीधे एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई?

जानकारी के अनुसार एक शिकायत के आधार पर विभाग ने मामले की जांच कराई। जांच के लिए प्रकरण हसदेव बरॉज जल प्रबंध उपसंभाग दर्री के अनुविभागीय अधिकारी (SDO) को सौंपा गया था। जांच रिपोर्ट के आधार पर कार्यपालन अभियंता कार्यालय ने कथित पत्रकार मयानाथ मौर्य को नोटिस जारी किया है।

जारी ज्ञापन के अनुसार शासकीय आवास में गंभीर स्तर की तोड़फोड़ की गई है। नोटिस में उल्लेख किया गया है कि मकान के लगभग सभी कमरों की सीलिंग, खिड़की, दरवाजे, किचन शेड, बाथरूम की टाइल्स, सामने का लोहे का गेट तथा कमरों की बिजली वायरिंग तक को नुकसान पहुंचाया गया है। विभाग का कहना है कि शासकीय संपत्ति को इस तरह क्षतिग्रस्त करना अपराध की श्रेणी में आता है।

इसके बावजूद विभाग ने सीधे पुलिस कार्रवाई करने के बजाय कथित आरोपी को 15 दिन की मोहलत दे दी है। नोटिस में कहा गया है कि 15 दिनों के भीतर मकान को यथास्थिति में सुधार कर विभाग को सौंप दिया जाए, अन्यथा शासकीय संपत्ति को नुकसान निवारण अधिनियम 1984 के तहत आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।

यहीं से पूरा मामला सवालों के घेरे में आ गया है। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि जब SDO की जांच में तोड़फोड़ और नुकसान की पुष्टि हो चुकी है, तब भी FIR दर्ज करने के बजाय चेतावनी देकर मामला निपटाने की कोशिश क्यों की जा रही है? क्या किसी कथित पत्रकार को बचाने की कोशिश हो रही है या फिर विभागीय स्तर पर ही मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है?

मामले को लेकर यह भी सवाल उठ रहा है कि यदि किसी आम व्यक्ति द्वारा शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता तो क्या उसे भी इसी तरह 15 दिन का समय देकर मामला शांत करने की कोशिश की जाती? या फिर तत्काल पुलिस में अपराध दर्ज कर कार्रवाई होती?

ज्ञापन में यह भी निर्देश दिया गया है कि यदि निर्धारित समयावधि में नुकसान की भरपाई नहीं की गई तो संबंधित अनुविभागीय अधिकारी को निकटतम थाने में आपराधिक प्रकरण दर्ज कराने की कार्रवाई करनी होगी। इसके अलावा विभाग के तकनीकी अधिकारियों को यह भी निर्देशित किया गया है कि मकान में लगे विद्युत उपकरणों और अन्य संरचनात्मक नुकसान का सूक्ष्म परीक्षण कर उसकी क्षतिपूर्ति का आंकलन तैयार किया जाए।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामलों में भी अब “समझौता मॉडल” लागू हो रहा है? क्योंकि यदि नुकसान की पुष्टि हो चुकी है तो सीधा आपराधिक मामला दर्ज होना चाहिए था, न कि आरोपी को पहले सब कुछ ठीक करने का मौका दिया जाता।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या 15 दिन बाद वाकई FIR दर्ज होगी या फिर यह मामला भी नोटिस और फाइलों के बीच ही कहीं दब कर रह जाएगा। फिलहाल इस नोटिस के बाद कथित पत्रकार गयानाथ मौर्य मुश्किलों में जरूर घिरते नजर आ रहे हैं, लेकिन असली सवाल अब भी वही है—क्या इस मामले में निष्पक्ष कार्रवाई होगी?

 
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