कोर्ट में गूंजा खौफनाक सच : “लाश के पास बैठा था आरोपी…” 5 साल तक सड़क के नीचे दबी रही सच्चाई, ऐसे टूटी कोरबा की सबसे उलझी मर्डर मिस्ट्री ! आईपीएस उदय किरण की फिर हुई शहर में चर्चा…

कोरबा। पांच साल तक एक गुमशुदगी की फाइल… फिर अचानक कंक्रीट की सड़क टूटी… और उसके नीचे से निकला ऐसा राज जिसने पूरे कोरबा को हिला दिया। अब उसी बहुचर्चित सलमा सुल्ताना लश्कर हत्याकांड में अदालत के भीतर दर्ज एक बयान ने उस खौफनाक रात की तस्वीर फिर से जिंदा कर दी है।
मंगलवार को अपर सत्र न्यायालय में जब मुख्य गवाह ने बयान देना शुरू किया, तो कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया। हर शब्द के साथ एक ऐसी कहानी खुल रही थी, जो अब तक केवल केस डायरी और चार्जशीट के पन्नों तक सीमित थी।
“मैंने देखा… वह सिगरेट पी रहा था”
मुख्य गवाह ने अदालत को बताया कि उसने मृतिका को निष्क्रिय अवस्था में देखा। वह स्तब्ध थी। उसके अनुसार, आरोपी कथित रूप से मृतिका के पास मौजूद था। गवाह ने कहा कि आरोपी एक हाथ से मृतिका के शरीर को थामे हुए था और दूसरे हाथ से सिगरेट पी रहा था।
गवाह के मुताबिक, आरोपी के चेहरे पर घबराहट या पछतावे के कोई स्पष्ट भाव नहीं थे। अदालत में यह बयान दर्ज होते ही माहौल गंभीर हो गया। अभियोजन पक्ष ने इसे केस की निर्णायक कड़ी बताया, जबकि बचाव पक्ष ने जिरह की तैयारी की बात कही।
डर, धमकी और कथित साजिश
गवाह के अनुसार, घटना के बाद उसे और एक अन्य युवती को कथित रूप से धमकाया गया। उनसे कहा गया कि यदि उन्होंने किसी को कुछ बताया तो उन्हें ही फंसा दिया जाएगा। गवाह ने अदालत में यह भी कहा कि मृतिका की स्कूटी घर छोड़ने और मोबाइल से भ्रामक संदेश भेजने के निर्देश दिए गए थे।
अभियोजन पक्ष का दावा है कि यह सब जांच को गुमराह करने का प्रयास था, ताकि गुमशुदगी की कहानी को आगे बढ़ाया जा सके। हालांकि बचाव पक्ष इन आरोपों से इनकार करता रहा है और मामले को साजिश करार देता है।
2018 : गुमशुदगी या कुछ और ?
वर्ष 2018 में सलमा सुल्ताना लश्कर अचानक लापता हो गई थीं। परिजनों ने गुमशुदगी दर्ज कराई। शुरुआती जांच में कोई ठोस सुराग नहीं मिला। मोबाइल बंद, कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं, और घटनास्थल का कोई स्पष्ट संकेत नहीं — मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ता गया।
समय बीतता गया। पांच साल गुजर गए। शहर की स्मृति से मामला लगभग धुंधला पड़ चुका था। लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में वह फाइल बंद नहीं हुई थी।
जब तत्कालीन एसपी ने बदली दिशा
तत्कालीन पुलिस अधीक्षक आईपीएस उदय किरण ने लंबित मामलों की समीक्षा के दौरान इस फाइल को फिर से उठाया। उन्होंने इसे केवल गुमशुदगी नहीं, बल्कि संभावित आपराधिक षड्यंत्र की तरह देखा।
एसपी ने विशेष जांच टीम गठित की। जांच की कमान तत्कालीन सीएसपी आईपीएस रॉबिन्सन गुड़िया और मानिकपुर चौकी प्रभारी प्रेमचंद साहू को सौंपी गई। टीम को स्पष्ट निर्देश था — “फाइल नहीं, सच्चाई खोजो।”
तकनीकी विश्लेषण बना टर्निंग पॉइंट
जांच टीम ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), लोकेशन डेटा और डिजिटल गतिविधियों का गहन विश्लेषण किया। कई महीनों की पड़ताल के बाद संदेह एक विशेष लोकेशन पर केंद्रित हुआ — कोरबा-दर्री रोड के फोरलेन क्षेत्र पर।
टीम को आशंका थी कि शव को सड़क निर्माण के दौरान दफनाया गया हो सकता है। यह संभावना अपने आप में असाधारण थी, क्योंकि इसका मतलब था कि सबूत को स्थायी रूप से मिटाने की कोशिश की गई थी।
जब टूटी कंक्रीट की सड़क
प्रशासनिक अनुमति और तकनीकी प्रक्रिया पूरी करने के बाद खुदाई का निर्णय लिया गया। भारी मशीनें पहुंचीं। कंक्रीट की मजबूत सड़क को तोड़ा गया। आसपास भीड़ जमा थी। हर कोई सांस रोके इंतजार कर रहा था।
कुछ ही समय में मिट्टी और कंक्रीट की परतों के नीचे से मानव कंकाल बरामद हुआ। वह क्षण पूरे मामले का निर्णायक मोड़ था।
शुरुआती पहचान मृतिका के फुटवियर और कपड़ों के अवशेष से की गई। बाद में डीएनए परीक्षण कराया गया। परिजनों के डीएनए से मिलान होने पर पुष्टि हुई कि कंकाल सलमा सुल्ताना लश्कर का ही था।
फिल्मी कहानी, लेकिन वास्तविक जांच
इस घटनाक्रम की तुलना कई लोगों ने फिल्मी कथानकों से की। लेकिन यहां कोई पटकथा नहीं थी, बल्कि वास्तविक वैज्ञानिक जांच थी। डिजिटल ट्रैकिंग, लोकेशन मैपिंग और संदिग्ध गतिविधियों की परत-दर-परत जांच ने पांच साल पुरानी गुत्थी सुलझाई।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यदि तकनीकी साक्ष्यों का गहराई से विश्लेषण न किया जाता, तो यह केस शायद हमेशा के लिए रहस्य बनकर रह जाता।
अब अदालत में निर्णायक दौर
अभियोजन पक्ष के अनुसार अब तक 41 गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं। कुछ गवाहों के बयान शेष हैं। मुख्य गवाह का ताजा बयान केस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बचाव पक्ष अदालत में अपनी दलीलें रख रहा है। अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा सभी साक्ष्यों और गवाहों के परीक्षण के बाद ही सुनाया जाएगा।
पांच साल की खामोशी, सड़क के नीचे दबी सच्चाई और अब अदालत में गूंजते बयान — इन सबने इस केस को कोरबा के आपराधिक इतिहास का एक अहम अध्याय बना दिया है।
नोट : मामला न्यायालय में विचाराधीन है। आरोपों की पुष्टि अंतिम निर्णय के बाद ही मानी जाएगी।
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