निगम की चेतावनी बेअसर ! बालको ने हेमस कॉर्पोरेशन से कराई नदी किनारे अवैध बाउंड्रीवाल, 3 दिन बाद भी न आवेदन, न शुल्क

कोरबा। नगर पालिक निगम कोरबा के स्पष्ट नोटिस और चेतावनी के बावजूद वेदांता की बालको इकाई की मनमानी थमने का नाम नहीं ले रही है। नेहरू नगर और बेलाकछार नदी किनारे सेक्टर-01 के पास बिना अनुमति बाउंड्रीवाल का निर्माण कराया जा रहा है और हैरानी की बात यह है कि यह काम हेमस कॉर्पोरेशन को सौंपा गया है, जिसका नाम पहले भी विवादों और गड़बड़ियों को लेकर चर्चा में रहा है।
2 फरवरी 2026 को निगम के भवन निर्माण अधिकारी ने वेदांता कंपनी लिमिटेड (बालको) के प्रमुख (प्रशासन) धनंजय मिश्रा को पत्र जारी कर साफ तौर पर कहा था कि बिना अनुमति निर्माण कार्य छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम अधिनियम 1956 (संशोधन 2012) और भूमि विकास नियम 1984 (संशोधन 2015) का सीधा उल्लंघन है। नोटिस में निर्माण कार्य तत्काल बंद करने और तीन दिन के भीतर विधिवत आवेदन व शुल्क जमा करने के निर्देश दिए गए थे, साथ ही चेताया गया था कि आदेश का पालन नहीं होने पर निर्माणाधीन बाउंड्रीवाल को तोड़ने की कार्रवाई की जाएगी और पूरा खर्च कंपनी से वसूला जाएगा।
लेकिन अब तीन दिन की समय सीमा खत्म हो चुकी है और निगम के पास न तो कोई आवेदन जमा हुआ है और न ही किसी शुल्क के भुगतान की जानकारी है। इससे साफ संकेत मिल रहा है कि कंपनी ने निगम के नोटिस को गंभीरता से लेने के बजाय नजरअंदाज करना ज्यादा आसान समझा।
इस पूरे मामले को और गंभीर बनाता है वह ठेकेदार, जिसे यह निर्माण कार्य दिया गया है। जानकारी के अनुसार यह काम हेमस कॉर्पोरेशन को सौंपा गया है, जिसका दामन पहले से ही विवादों से जुड़ा रहा है। ऐसे ठेकेदार के माध्यम से नदी किनारे बिना अनुमति निर्माण कराना कई सवाल खड़े कर रहा है—क्या यह सब सोची-समझी रणनीति के तहत हो रहा है?
शहर में यह भी चर्चा है कि जब से बालको में सीईओ राजेश कुमार की पदस्थापना हुई है, तब से कंपनी की पुरानी कार्यशैली फिर से लौटती दिख रही है। बालको की पुरानी फितरत मानी जाती रही है—पहले बिना अनुमति काम शुरू करो, फिर बाद में उसे वैध कराने की कोशिश करो। इस बार भी वही पैटर्न साफ नजर आ रहा है—पहले दीवार खड़ी करो, फिर नियमों को कागजों में पूरा करने की कोशिश करो।
नदी किनारे जैसे संवेदनशील क्षेत्र में बिना अनुमति निर्माण कराना सिर्फ नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि सीधे तौर पर प्रशासनिक व्यवस्था को चुनौती देना है। निगम ने नोटिस की प्रतिलिपि बालको चौकी थाना प्रभारी और अतिक्रमण प्रभारी को भी भेजी थी, ताकि जरूरत पड़ने पर तत्काल कार्रवाई हो सके। इसके बावजूद कंपनी की ओर से कोई पहल नहीं होना यह दर्शाता है कि नियमों को कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल निगम प्रशासन की सख्ती पर है। अगर तीन दिन की चेतावनी के बाद भी न आवेदन आया, न शुल्क जमा हुआ और न निर्माण रुका, तो क्या वाकई बाउंड्रीवाल तोड़ने की कार्रवाई होगी? या फिर मामला हमेशा की तरह कागजों में दबकर रह जाएगा?
शहर में लोग खुलकर कह रहे हैं कि अगर कोई आम नागरिक बिना अनुमति एक छोटी सी दीवार भी बना दे तो निगम तुरंत बुलडोजर लेकर पहुंच जाता है, लेकिन जब बात बालको और उससे जुड़े ठेकेदारों की आती है तो नियम सिर्फ नोटिस तक सीमित रह जाते हैं। अगर इस बार भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह साफ संकेत होगा कि बड़ी कंपनियां और उनके पसंदीदा ठेकेदार नियमों से ऊपर खुद को समझने लगे हैं।
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