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Adani Power का 1600 मेगावाट विस्तार : विकास का वादा या कोरबा के स्वास्थ्य पर नया खतरा ? जनसुनवाई में 95% समर्थन का दावा, पर क्या दबा दिए गए असली सवाल ? औद्योगिक नगरी बन चुका कोरबा, बदले में मिला राख का गुबार और प्रदूषित हवा ? Adani Expansion पर जनविश्वास की परीक्षा अब शुरू !

कोरबा। 27 फरवरी को आयोजित जनसुनवाई के बाद 1600 मेगावाट क्षमता विस्तार परियोजना को लेकर 95 प्रतिशत समर्थन का दावा किया गया। मंच से विकास, रोजगार, सामाजिक सरोकार और तकनीकी उन्नयन की बातें कही गईं। लेकिन क्या इतनी बड़ी परियोजना केवल तालियों और उपस्थिति के आधार पर आगे बढ़ाई जा सकती है ? क्या कोरबा जैसे पहले से औद्योगिक दबाव झेल रहे जिले में विस्तार से पहले स्वास्थ्य, पर्यावरण और बुनियादी ढांचे की वास्तविक स्थिति का ईमानदार मूल्यांकन हुआ ? Adani Power द्वारा प्रस्तावित 800-800 मेगावाट की दो नई इकाइयों को अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल तकनीक आधारित बताया जा रहा है, जिससे अपेक्षाकृत कम उत्सर्जन का दावा है। निवेश 16,611 करोड़ रुपये का है। कंपनी का कहना है कि अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता नहीं होगी। लेकिन सवाल यह है कि जमीन ही पर्याप्त पैमाना है या पर्यावरणीय वहन क्षमता भी कोई मायने रखती है ?

कोरबा पहले से कितना बोझ झेल रहा है ?

कोरबा को वर्षों से ऊर्जा राजधानी कहा जाता है। बड़े-बड़े तापीय संयंत्र, कोयला खदानें और भारी उद्योग पहले से मौजूद हैं। शहर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता, धूल, राख और ट्रांसपोर्ट दबाव की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। ऐसे में 1600 मेगावाट का अतिरिक्त बोझ क्या पर्यावरणीय संतुलन को और कमजोर नहीं करेगा ? क्या क्यूम्युलेटिव इम्पैक्ट असेसमेंट सार्वजनिक रूप से साझा किया गया ? रोजाना सड़कों पर उड़ती राख, ओवरलोड ट्रकों से टूटी सड़कें, कंक्रीट के फैलते ढांचे और हरियाली का सिमटना — क्या यही विकास का चेहरा है ?

स्वास्थ्य पर असर का आकलन हुआ या नहीं ?

सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य का है। श्वसन रोग, एलर्जी और त्वचा संबंधी समस्याओं को लेकर समय-समय पर चिंताएं जताई जाती रही हैं। क्या विस्तार से पहले व्यापक स्वास्थ्य सर्वे कराया गया ? क्या आसपास के गांवों में दीर्घकालिक मेडिकल डेटा का अध्ययन हुआ ? यदि नहीं, तो अतिरिक्त उत्सर्जन और राख प्रबंधन का असर किस आधार पर सुरक्षित बताया जा रहा है ? क्या रीयल-टाइम वायु गुणवत्ता निगरानी डेटा सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध होगा ? क्या भूजल परीक्षण की नियमित रिपोर्ट साझा की जाएगी ?

95 प्रतिशत समर्थन का आधार क्या ?

जनसुनवाई में 95 प्रतिशत समर्थन का दावा किया गया। लेकिन कुल उपस्थिति कितनी थी ? कितनी लिखित आपत्तियां दर्ज हुईं ? कितने लोगों को बोलने का अवसर मिला ? क्या पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग और आपत्तियों की सूची सार्वजनिक की जाएगी ? पारदर्शिता ही भरोसे की नींव है, वरना आंकड़े केवल दावे बनकर रह जाते हैं। जनसुनवाई से पहले विरोध की आवाजें भी सुनाई दी थीं। सवाल यह है कि क्या सभी पक्षों को समान अवसर मिला ? या केवल समर्थन की आवाजें ही प्रमुख रहीं ?

रोजगार के वादे : ठोस आंकड़े कहां हैं ?

हजारों नौकरियों और स्वरोजगार के अवसरों की बात कही गई। लेकिन स्थायी पदों की संख्या कितनी होगी ? स्थानीय युवाओं के लिए आरक्षण या प्राथमिकता का स्पष्ट प्रावधान क्या है ? अनुबंध आधारित काम में स्थानीय भागीदारी का प्रतिशत कितना तय होगा ? बिना स्पष्ट समयसीमा और लिखित प्रतिबद्धता के रोजगार के वादे कितने भरोसेमंद हैं ? क्या रोजगार डेटा सार्वजनिक डैशबोर्ड पर अपडेट किया जाएगा ?

राख प्रबंधन और जल उपयोग : क्या पर्याप्त तैयारी ?

अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल तकनीक कम उत्सर्जन का दावा करती है, लेकिन राखड़ निस्तारण और जल उपयोग सबसे गंभीर मुद्दे हैं। राख का परिवहन, डंपिंग और पुन: उपयोग की स्पष्ट कार्ययोजना क्या है ? क्या राख तालाबों की क्षमता और सुरक्षा ऑडिट सार्वजनिक है ? जल स्रोतों पर प्रभाव का स्वतंत्र अध्ययन हुआ ? क्या किसानों और ग्रामीणों के लिए जल उपलब्धता पर असर का आकलन किया गया ?

बुनियादी ढांचा : सड़कें और ट्रैफिक का दबाव

कोयला और राख के परिवहन से पहले ही सड़कें जर्जर हैं। क्या विस्तार से पहले सड़क चौड़ीकरण और मरम्मत की बाध्यकारी शर्तें तय की गईं ? क्या ट्रकों की आवाजाही के लिए वैकल्पिक मार्ग या रेल आधारित परिवहन की व्यवस्था अनिवार्य होगी ? यदि नहीं, तो टूटी सड़कों और बढ़ते धूल प्रदूषण का बोझ कौन उठाएगा ?

विकास बनाम जीवन की गुणवत्ता

सवाल विकास का विरोध नहीं है। सवाल संतुलन का है। क्या औद्योगिक विस्तार के साथ हरित पट्टी, स्वास्थ्य निगरानी, पारदर्शी डेटा और सामाजिक जवाबदेही को समान महत्व मिलेगा ? या फिर कोरबा को केवल उत्पादन क्षमता के आंकड़ों से आंका जाएगा ? क्या जिले के नागरिकों को साफ हवा, सुरक्षित पानी और बेहतर जीवन की गारंटी मिलेगी ?

जनविश्वास की असली परीक्षा

16,611 करोड़ रुपये का निवेश केवल आर्थिक परियोजना नहीं, बल्कि सामाजिक अनुबंध है। यदि सभी पर्यावरणीय शर्तें, निगरानी तंत्र और स्वास्थ्य सुरक्षा उपाय सार्वजनिक किए जाते हैं, तो भरोसा मजबूत होगा। अन्यथा, “विकास” और “समर्थन” के दावे संदेह में रहेंगे। कोरबा पहले ही औद्योगिक पहचान से घिरा है। अब यह तय करना होगा कि अगला कदम टिकाऊ विकास की दिशा में होगा या फिर राख, धूल और बढ़ते प्रदूषण की ओर एक और कदम ? अब सवाल यह है : क्या विस्तार से पहले सभी चिंताओं का समाधान पारदर्शी तरीके से होगा ? या फिर आंकड़ों और दावों के बीच असली मुद्दे दब जाएंगे ?  
 
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