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पड़ताल : कोरबा शिक्षा विभाग में ‘खुला खेल’, 11 साल से गायब कर्मचारी की ज्वाइनिंग, सस्पेंड–बहाली का फार्मूला और अटैचमेंट पर बैन के बावजूद आदेश, देखिए प्रभारी डीईओ उपाध्याय की तमाम करतूत…

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कोरबा। छत्तीसगढ़ सरकार स्कूल शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए नई शिक्षा नीति, युक्तियुक्तकरण और सख्त प्रशासनिक नियमों की बात कर रही है, लेकिन कोरबा जिला शिक्षा कार्यालय की कार्यप्रणाली इन तमाम दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। बीते कुछ दिनों में सामने आए मामलों ने यह साफ कर दिया है कि यहां फैसले नियमों के आधार पर नहीं, बल्कि सुविधा और सेटिंग के आधार पर लिए जा रहे हैं।

Gram Yatra Chhattisgarh की विस्तृत पड़ताल में यह सामने आया है कि कोरबा में पदस्थ प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी एवं मूल प्राचार्य तामेश्वर उपाध्याय के कार्यकाल में शिक्षा विभाग से जुड़े कई ऐसे आदेश जारी हुए, जो सीधे-सीधे शासन के नियमों, संवैधानिक प्रक्रिया और विभागीय निर्देशों के विपरीत हैं।


11 साल तक ड्यूटी से गायब भृत्य, फिर भी बर्खास्तगी नहीं… ज्वाइनिंग करा दी

सबसे गंभीर और चौंकाने वाला मामला शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल कुदुरमाल से जुड़ा है। यहां भृत्य के पद पर पदस्थ राय सिंह जगत वर्ष 22 नवंबर 2014 से लगातार बिना सूचना, बिना स्वीकृत अवकाश और बिना विभागीय अनुमति के अनुपस्थित रहा।

पूरे 11 वर्षों तक न तो कर्मचारी ने ड्यूटी जॉइन की, न ही उसकी अनुपस्थिति का संतोषजनक जवाब प्रस्तुत किया गया।

सेवा नियमों के अनुसार, यदि कोई शासकीय कर्मचारी तीन वर्ष से अधिक समय तक अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहता है, तो उसका मामला सामान्य विभागीय कार्रवाई का नहीं होता। ऐसे मामलों में प्रकरण का निराकरण राज्यपाल के स्तर से किया जाना अनिवार्य होता है।

लेकिन कोरबा में न तो यह प्रकरण राज्यपाल सचिवालय को भेजा गया और न ही बर्खास्तगी की प्रक्रिया अपनाई गई। इसके उलट जिला शिक्षा कार्यालय से आदेश जारी कर उसी स्कूल में कर्मचारी की ज्वाइनिंग करा दी गई।

यह न केवल नियमों की अवहेलना है, बल्कि अधिकार क्षेत्र का खुला उल्लंघन भी माना जा रहा है।


युक्तियुक्तकरण से बचाने का तरीका : पहले निलंबन, फिर बहाली और मनचाही पोस्टिंग

दूसरा मामला सहायक शिक्षक जितेंद्र कुमार दिनकर से जुड़ा है। वे कटघोरा विकासखंड के प्राथमिक शाला मोहरियामुड़ा में पदस्थ थे। युक्तियुक्तकरण के तहत उन्हें कोरबा विकासखंड के दुर्गम क्षेत्र स्थित प्राथमिक शाला रापता में पदस्थ किया गया।

बताया जाता है कि शिक्षक को दुर्गम क्षेत्र में जाना स्वीकार नहीं था। इसके बाद 19 सितंबर को उन्हें निलंबित कर दिया गया। शिकायत, आरोप पत्र और विभागीय कार्रवाई का हवाला दिया गया।

कुछ ही समय बाद शिक्षक ने भविष्य में इस प्रकार की गलती न दोहराने की बात कहते हुए क्षमा याचना प्रस्तुत की और महज 42 दिनों के भीतर निलंबन समाप्त कर दिया गया।

बहाली के साथ ही शिक्षक को पाली विकासखंड के प्राथमिक शाला बोकरामुड़ा में पदस्थ कर दिया गया, जिसे अपेक्षाकृत सुविधाजनक क्षेत्र माना जाता है।

शिक्षकों के बीच चर्चा है कि अब निलंबन अनुशासन सुधार का माध्यम नहीं, बल्कि युक्तियुक्तकरण से बचने का रास्ता बनता जा रहा है।


फटकार पड़ी तो तीन घंटे में आदेश निरस्त

जब निलंबन–बहाली का यह मामला सार्वजनिक हुआ और उच्च स्तर तक पहुंचा, तो शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया। सूत्रों के अनुसार DPI स्तर से कड़ी आपत्ति दर्ज कराई गई।

इसके बाद प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी ने तीन घंटे के भीतर अपना ही आदेश निरस्त कर दिया। हालांकि आदेश वापस ले लिया गया, लेकिन न तो किसी प्रकार की जिम्मेदारी तय की गई और न ही विभागीय जांच शुरू की गई।


अटैचमेंट पर कैबिनेट बैन, फिर भी महिला शिक्षिका शहर में संलग्न

एक और मामला महिला सहायक शिक्षिका ज्योति श्रीवास से जुड़ा है। वे कटघोरा विकासखंड के ग्रामीण क्षेत्र स्थित प्राथमिक शाला चोरभट्टी में पदस्थ थीं।

दिनांक 28 नवंबर को जारी आदेश में उन्हें कोरबा शहर के प्राथमिक शाला पाड़ीमार में संलग्न कर दिया गया।

यह आदेश उस समय जारी किया गया, जब राज्य सरकार कैबिनेट स्तर पर शिक्षकों के अटैचमेंट पर पूर्ण प्रतिबंध लगा चुकी है और यह प्रतिबंध ट्रांसफर नीति में भी स्पष्ट रूप से दर्ज है।

कुछ माह पहले दिव्यांग एवं गंभीर बीमारी से पीड़ित शिक्षकों की अर्जियां नियमों का हवाला देकर खारिज कर दी गई थीं। अब एक साधारण आवेदन पर नियमों को दरकिनार कर दिया गया।


चार मामले, एक ही तरीका

चारों मामलों को जोड़कर देखें तो एक ही पैटर्न उभरकर सामने आता है — जहां राहत देनी हो वहां नियम लचीले और जहां दबाव बनाना हो वहां नियम सख्त। आदेश गलत साबित हो जाए तो चुपचाप निरस्त कर दिया जाता है, लेकिन जवाबदेही तय नहीं होती।

प्रभारी DEO और मूल प्राचार्य की दोहरी भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि नीति, आदेश और क्रियान्वयन — तीनों एक ही व्यवस्था के भीतर सिमटे नजर आते हैं।


सबसे बड़ा सवाल

लगातार खुलासों के बावजूद क्या इन आदेशों की स्वतंत्र जांच होगी? क्या राज्यपाल स्तर से निराकरण योग्य मामलों को जिला स्तर पर निपटाना गंभीर उल्लंघन नहीं है? और क्या कभी जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी?

Gram Yatra Chhattisgarh इस पूरे प्रकरण पर नजर बनाए हुए है। आने वाले दिनों में इससे जुड़े और दस्तावेज व तथ्य सामने लाए जाएंगे।

क्रमशः…

 
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