एक आदमी, तीन फर्में और एक स्क्रिप्ट ! कोरबा स्वास्थ्य विभाग में एसी खरीदी के नाम पर जमकर हुआ खेल, 19 लाख में खरीदी जा रही एक एसी, दरें खुलते ही पूरा गठजोड़ बेनकाब

कोरबा। कोरबा जिले के स्वास्थ्य विभाग में एयर कंडीशनर खरीदी को लेकर उठ रहे सवाल अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचते नजर आ रहे हैं। सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) के जरिए की जा रही इस खरीदी में जैसे ही तकनीकी पात्रता के बाद वित्तीय दरें सामने आईं, वैसे ही यह साफ हो गया कि यह प्रक्रिया किसी सामान्य सरकारी खरीदी की नहीं, बल्कि पहले से तय एक स्क्रिप्ट के तहत आगे बढ़ाई गई थी। अब तक जो आशंकाएं जताई जा रही थीं, वे अब तथ्यों और आंकड़ों के साथ सामने आ चुकी हैं।
इस फॉलो-अप रिपोर्ट में सबसे अहम और चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इस खरीदी में जिन तीन फर्मों को तकनीकी रूप से पात्र घोषित किया गया, वे तीनों प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक ही व्यक्ति दिनेश अग्रवाल से जुड़ी हुई हैं। नाम भले अलग-अलग हों, लेकिन नियंत्रण, संपर्क और विभागीय पकड़ एक ही धुरी पर घूमती दिखाई देती है। जानकारों के अनुसार, यही वह बिंदु है जहां से स्वास्थ्य विभाग में एसी खरीदी के नाम पर भ्रष्टाचार की पूरी पटकथा तैयार की गई।
तीन फर्में, एक ही धागा
अब बात उन फर्मों की, जिन्हें इस खरीदी में पात्र घोषित किया गया। सबसे प्रमुख नाम Scientific India Private Limited का है। सामने आई जानकारी के मुताबिक यह फर्म दिनेश अग्रवाल से जुड़ी हुई है और इसे उनकी पत्नी वर्षा अग्रवाल के नाम पर उनके ही आवासीय पते साईं सुगंधा, कोरबा पर पंजीकृत कराया गया है।
कागजों में यह फर्म भले ही अलग दिखाई दे, लेकिन इसके बिल और दस्तावेजों में दर्ज मोबाइल नंबर वही बताया जा रहा है, जिसे दिनेश अग्रवाल स्वयं उपयोग करते हैं। नियमों के जानकारों का कहना है कि यह स्थिति किसी भी तरह से स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा की भावना के अनुरूप नहीं है।
दिनेश अग्रवाल की मुख्य फर्म आईटी केयर पहले से ही कोरबा स्वास्थ्य विभाग में एक जाना-पहचाना नाम है। वर्षों से कंप्यूटर मेंटेनेंस, प्रिंटर रिपेयरिंग और कार्ट्रिज रिफिलिंग जैसे अधिकांश काम इसी फर्म को मिलते रहे हैं।
विभागीय हलकों में यह चर्चा आम है कि जिन प्रिंटरों की कीमत बाजार में कुछ हजार रुपये होती है, उनसे कहीं अधिक राशि हर साल रिपेयरिंग के नाम पर भुगतान कर दी जाती है। यही वजह है कि विभाग के भीतर इस फर्म को व्यंग्य में “स्वास्थ्य विभाग का दामाद” कहा जाने लगा है।
ऐसे में उसी व्यक्ति से जुड़ी दूसरी फर्म का एसी जैसी बड़ी खरीदी में सामने आना गंभीर सवाल खड़े करता है।
तीसरी फर्म भी शक के घेरे में
तीसरी पात्र फर्म हिमालया कूल को लेकर भी स्थिति कम संदिग्ध नहीं है। स्थानीय स्तर पर जानकारी जुटाने पर पता चलता है कि यह फर्म बुधवारी बाजार के पास एसी और फ्रिज की एक छोटी दुकान के रूप में काम करती है, जहां मुख्य रूप से रिपेयरिंग और सर्विसिंग की जाती है।
यह फर्म Aquaguard की अधिकृत सर्विस सेंटर जरूर बताई जाती है, लेकिन बड़े स्तर पर एसी की आपूर्ति और इंस्टॉलेशन का अनुभव होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इसके बावजूद इस फर्म को भी तकनीकी रूप से पात्र घोषित कर दिया गया।
दरें खुलीं तो खेल साफ
अब जब वित्तीय दरें सामने आई हैं, तो पूरा खेल और साफ हो गया है। GeM पोर्टल पर दिखाई दे रही दरों के अनुसार—
- Scientific India Private Limited ने करीब उन्नीस लाख चौंतीस हजार रुपये
- दूसरी पात्र फर्म ने लगभग बीस लाख रुपये
- तीसरी फर्म ने बाईस लाख रुपये से अधिक की दर कोट की है
तीनों दरों का लगभग एक-दूसरे के आसपास होना इस ओर इशारा करता है कि यहां वास्तविक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि पहले से तय कीमतों का खेल खेला गया।
यहां यह सवाल भी बेहद अहम है कि खुले बाजार में जिस एसी की कीमत लगभग तीस से पैंतीस हजार रुपये बताई जाती है, वही एसी सरकारी खरीदी में लाखों रुपये में कैसे दिखाई जा रही है।
इस पूरे मामले को समझने से पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ के अन्य विभागों में 32 हजार का जग और 1320 की चप्पल खरीदी गई थी। ऐसे ही 30 हजार एसी 19 लाख में की जा रही यह खरीदी पूरी तरह कोरबा स्वास्थ्य विभाग और CMHO कार्यालय से संबंधित है। इसलिए इसे किसी अन्य विभाग की मिसाल बताकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यहां सीधे तौर पर सवाल स्वास्थ्य विभाग की प्रक्रिया, पात्रता और नीयत पर खड़े हो रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, यह खरीदी जिले के पांच अलग-अलग विकासखण्ड मुख्यालयों में स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से जुड़ी है, जहां मरीजों की सुविधा के लिए अलग-अलग वार्डों में एसी लगाए जाने हैं। सामान्य सरकारी नियमों के मुताबिक ऐसी स्थिति में खरीदी की वास्तविक आवश्यकता, संभावित संख्या, साइट-वाइज इंस्टॉलेशन, ट्रांसपोर्टिंग और लॉजिस्टिक खर्च को स्पष्ट रूप से दर्शाना अनिवार्य होता है।
लेकिन इस मामले में GeM पोर्टल पर पूरी खरीदी को केवल एक एसी के रूप में दिखाया गया। यही वह बिंदु है, जहां से संदेह गहराता है और पूरी प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ जाती है।
Reverse Auction नहीं, ताकि रेट नीचे न जाए
पूरी प्रक्रिया में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि Reverse Auction जैसी प्रतिस्पर्धी व्यवस्था को लागू नहीं किया गया। GeM का मूल उद्देश्य यही है कि अधिकतम प्रतिस्पर्धा के जरिए सरकार को न्यूनतम दर पर सामग्री उपलब्ध हो।
लेकिन यहां Reverse Auction को जानबूझकर लागू नहीं किया गया, जिससे दरों को खुले मुकाबले से दूर रखा गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह प्रक्रिया अपनाई जाती, तो कीमतें काफी नीचे आ सकती थीं।
CMHO कार्यालय की भूमिका भी सवालों के घेरे में
इन तमाम तथ्यों के बीच CMHO कार्यालय की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि खरीदी की पूरी रूपरेखा यहीं तैयार की गई और उसे इस तरह गढ़ा गया कि अंत में वही फर्में लाभ में रहें, जिनकी विभाग के भीतर पहले से पकड़ है।
विभागीय सूत्रों का कहना है कि यह कोई नई कहानी नहीं है, बल्कि वर्षों से चलता आ रहा वही पैटर्न है, जिसमें जरूरत बदलती है लेकिन लाभार्थी नहीं।
स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विभाग में, जहां हर रुपये का सीधा संबंध मरीजों के इलाज और सुविधा से होता है, वहां इस तरह की खरीदी गंभीर चिंता का विषय है।
अब जबकि फर्मों का गठजोड़, पात्रता की प्रक्रिया और दरों की वास्तविकता सामने आ चुकी है, सवाल यह है कि क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी या फिर यह भी पिछली कई खरीदियों की तरह फाइलों में दबा दी जाएगी।
यह फॉलो-अप रिपोर्ट केवल एक एसी खरीदी पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि कोरबा स्वास्थ्य विभाग में वर्षों से चली आ रही उस व्यवस्था पर भी रोशनी डालती है, जहां हर बार नई जरूरत के नाम पर वही पुरानी स्क्रिप्ट दोहराई जाती है।
इन फर्मों की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। दिनेश अग्रवाल की इन दोनों फर्मों ने क्या-क्या खेल रचा है और स्वास्थ्य विभाग में कैसे होता है सिस्टम का खेल—
“ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़” जल्द करेगा बड़ा खुलासा। स्वास्थ्य विभाग में हो रहे खेल की यह सीरीज जारी रहेगी…
Live Cricket Info