अपराधराज्य एव शहररोचक तथ्य

मरीज के गले में अटकती जान और गोपाल कंवर की “अनभिज्ञता”, मेडिकल कॉलेज अस्पताल प्रबंधन कटघरे में

कोरबा। मेडिकल कॉलेज अस्पताल में टीबी मरीज के भोजन में बाल और लकड़ी का तिनका निकलने की घटना ने अस्पताल प्रशासन की संवेदनहीनता और लापरवाही को बेनकाब कर दिया है। मरीज का गला अटकना, सांस रुकने जैसी स्थिति बनना और परिजनों द्वारा किसी तरह जान बचाया जाना—यह सब अस्पताल परिसर के भीतर हुआ, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि इतने गंभीर मामले पर मेडिकल कॉलेज अस्पताल के संयुक्त संचालक डॉ गोपाल कंवर ने पल्ला झाड़ते हुए कहा कि “उन्हें अभी तक इसकी जानकारी नहीं मिली।”

सवाल यह है कि आखिर संयुक्त संचालक की जिम्मेदारी क्या सिर्फ फाइलों और बैठकों तक सीमित है? क्या अस्पताल के वार्डों में मरीजों के साथ क्या हो रहा है, इसकी जानकारी रखना उनका काम नहीं? या फिर “जानकारी नहीं मिली” कहना अब हर बड़ी लापरवाही से बचने का सबसे सुरक्षित बहाना बन चुका है?

जिस मरीज की जान पर बन आई, वह कोई साधारण मरीज नहीं बल्कि पिछले तीन वर्षों से टीबी जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है और तीन महीने से अस्पताल के टीबी वार्ड में भर्ती है। ऐसे मरीज को दूषित भोजन परोसा जाना सिर्फ ठेका कंपनी की गलती नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम की विफलता है, जिसकी निगरानी का जिम्मा सीधे तौर पर मेडिकल कॉलेज प्रशासन और संयुक्त संचालक पर आता है।

अस्पताल में भोजन आपूर्ति का ठेका निजी कंपनी को दिया गया है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि उसकी निगरानी कौन कर रहा है? क्या कभी भोजन की गुणवत्ता की जांच हुई? क्या मरीजों की शिकायतों को गंभीरता से सुना जाता है या फिर उन्हें रजिस्टर और फाइलों में दबा दिया जाता है? अगर यह सब संयुक्त संचालक के संज्ञान में नहीं आता, तो फिर उनकी भूमिका पर सवाल उठना लाजिमी है।

सबसे चिंताजनक बात यह रही कि घटना के बाद न तो तत्काल कोई जांच शुरू की गई और न ही मरीज या उसके परिजनों से औपचारिक बयान लिया गया। उल्टे, जिम्मेदार अधिकारी खुद को “अनजान” बताकर जिम्मेदारी से बचते नजर आए। यह रवैया साफ दिखाता है कि मरीजों की जान से ज्यादा अधिकारियों के लिए अपनी कुर्सी और बचाव बयान अहम हैं।

गोपाल कंवर द्वारा दिया गया यह बयान कि “मामले को संज्ञान में लेकर पूछताछ की जाएगी”, अब एक घिसा-पिटा जुमला बन चुका है। सवाल यह नहीं है कि पूछताछ होगी या नहीं, सवाल यह है कि अब तक क्यों नहीं हुई? क्या किसी मरीज की मौत के बाद ही प्रशासन हरकत में आएगा?

यह मामला सिर्फ एक थाली भोजन का नहीं, बल्कि पूरे मेडिकल कॉलेज अस्पताल की कार्यप्रणाली पर करारा तमाचा है। अगर समय रहते मरीज की पत्नी ने सतर्कता नहीं दिखाई होती, तो आज यह खबर “अस्पताल की लापरवाही से मरीज की मौत” में बदल चुकी होती। ऐसे में संयुक्त संचालक की चुप्पी और अनभिज्ञता अपने आप में एक बड़ा आरोप है, जिसका जवाब अब सिर्फ बयान नहीं, ठोस और कड़ी कार्रवाई से दिया जाना चाहिए।

 
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