कलेक्टर कोर्ट का आदेश धरा रह गया ! फैसले के बाद भी नहीं हुई कार्रवाई, तहसीलदार ने रोक रखा है बेदखली — 7 साल से भटक रहा पहाड़ी कोरवा परिवार, आदेश स्पष्ट, फिर भी जमीनी हकीकत उलट — राजस्व विभाग की भूमिका पर सवाल
कोरबा। पहाड़ी कोरवा आदिवासी की पुश्तैनी जमीन पर कब्जे का मामला अब प्रशासनिक निष्क्रियता का जीता-जागता उदाहरण बन गया है। अपर कलेक्टर न्यायालय से 24 मार्च 2026 को पारित स्पष्ट आदेश के बावजूद आज तक जमीन खाली नहीं कराई गई है, जिससे पूरे राजस्व अमले की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

मामला प्रकरण क्रमांक 202411050100054/2024-25 से जुड़ा हुआ है, जिसमें न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से यह पाया गया कि जमीन का अंतरण संदिग्ध और फर्जी परिस्थितियों में किया गया है और वास्तविक अधिकार पीड़ित पहाड़ी कोरवा फिरतराम व उनके परिजनों के पक्ष में है। आदेश में बेदखली की दिशा में कार्यवाही सुनिश्चित करने के संकेत भी दिए गए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
सबसे अहम बात यह है कि आदेश पारित हुए 15 दिन बीत जाने के बाद भी तहसीलदार स्तर पर कार्रवाई रोककर रखी गई है। सूत्रों के अनुसार, राजस्व अमला पूरी तरह से निष्क्रिय बना हुआ है और बेदखली की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जा रही है।
इस मामले में पीड़ित पहाड़ी कोरवा फिरत राम पिछले 5 से 7 वर्षों से न्याय के लिए संघर्ष कर रहा है। उसने सीमांकन कराया, न्यायालय में प्रकरण दायर किया, एफआईआर दर्ज कराई और हर स्तर पर अपनी लड़ाई लड़ी, लेकिन अब तक उसे उसका हक नहीं मिल पाया है।
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि जानबूझकर कार्रवाई में देरी की जा रही है, ताकि कब्जाधारी पक्ष को उच्च न्यायालय जाने का अवसर मिल सके। यदि ऐसा है, तो यह सीधे-सीधे न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने जैसा है, क्योंकि आदेश के क्रियान्वयन में देरी का लाभ कब्जाधारियों को ही मिल रहा है।
इस पूरे प्रकरण में रंजना सिंह और चेतन चौधरी का नाम लगातार सामने आ रहा है। रंजना सिंह वही महिला बताई जा रही है, जिसने कथित तौर पर फर्जी जाति प्रमाणपत्र बनाकर खुद को आदिवासी दर्शाया और पहाड़ी कोरवा की जमीन पर कब्जा किया। जांच में यह प्रमाणपत्र निलंबित भी किया जा चुका है, लेकिन इसके बावजूद जमीन पर कब्जा अब भी कायम है।
सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि —
जब 24 मार्च 2026 को अपर कलेक्टर न्यायालय आदेश दे चुका है, प्रकरण स्पष्ट है और फर्जीवाड़ा साबित हो चुका है, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही ?
क्या तहसीलदार जानबूझकर कार्रवाई रोक रहे हैं ?
क्या कब्जाधारियों को बचाने के लिए समय दिया जा रहा है ?
या फिर इसके पीछे कोई और बड़ा दबाव काम कर रहा है ?
फिलहाल, पीड़ित पहाड़ी कोरवा परिवार की नजरें प्रशासन पर टिकी हैं, लेकिन हर बीतता दिन यह सवाल और गहरा कर रहा है कि आखिर उसे अपने ही हक के लिए और कितना इंतजार करना पड़ेगा।

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