RTI को मज़ाक समझना पड़ा भारी, हाईकोर्ट का कड़ा प्रहार — दोषी अफसरों पर कार्रवाई तय

बिलासपुर : सूचना के अधिकार को वर्षों तक ठेंगा दिखाने वाले अधिकारियों के खिलाफ अब कानून ने खुद मोर्चा संभाल लिया है। बार-बार आदेश, अपील और कानूनी लड़ाई के बावजूद जब विभाग ने RTI के तहत जानकारी देने से इनकार किया, तो मजबूर होकर याचिकाकर्ता को उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
कोर्ट की तल्ख टिप्पणी : RTI अधिनियम का मखौल उड़ाया गया
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता तपन कुमार चंद्रा की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने बेहद सख़्त रुख अपनाते हुए कहा कि
“अधिकारियों ने RTI अधिनियम, 2005 की मूल भावना का मज़ाक बना दिया है।”
कोर्ट ने साफ कहा कि सूचना न देना केवल लापरवाही नहीं, बल्कि कानूनी अपराध की श्रेणी में आता है।
हाईकोर्ट का स्पष्ट आदेश : अब बख्शे नहीं जाएंगे अफसर
न्यायालय ने अपने आदेश में दो टूक कहा कि
RTI अधिनियम की धारा 18 के अंतर्गत यदि कोई अधिकारी जानबूझकर सूचना देने में विफल रहता है, तो राज्य सूचना आयोग की जिम्मेदारी है कि वह दोषी अधिकारी के विरुद्ध जाँच कर कठोर कार्रवाई करे।
2 महीने की अल्टीमेटम, दोषी अफसरों पर शिकंजा
- राज्य सूचना आयोग (प्रतिवादी क्रमांक-2) को दो महीने के भीतर पूरे प्रकरण की विस्तृत जाँच करने के निर्देश
- उन सभी दोषी अधिकारियों की पहचान जो आदेशों के बावजूद सूचना दबाए रहे
- RTI अधिनियम के तहत दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करने का आदेश
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि मामले को टालना या लीपापोती करना अब अदालत की अवमानना माना जा सकता है।
राजस्व विभाग से लेकर तहसीलों तक हड़कंप
इस फैसले के बाद राजस्व विभाग, तहसील कार्यालयों और अन्य दफ्तरों के सूचना अधिकारियों में भारी हड़कंप मच गया है।
भ्रष्ट अधिकारी वर्ग में जो RTI को हल्के में लेने की जो परंपरा चल रही थी, उस पर हाईकोर्ट ने करारा तमाचा जड़ दिया है।
साफ संदेश : जनता के अधिकारों से खेलोगे तो सज़ा तय
हाईकोर्ट के इस सख़्त हस्तक्षेप ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को साफ संदेश दे दिया है कि
- RTI को दबाना अब सुरक्षित नहीं
- जनता के सवालों से भागने वाले अफसर अब जांच के घेरे में आएंगे
- कानून की अनदेखी करने वालों को जवाबदेह ठहराया जाएगा
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