
कोरबा। बरबसपुर में नया ट्रांसपोर्ट नगर बसाने की कवायद एक बार फिर तेज हो गई है। तीन साल से अटकी इस योजना को पुनर्जीवित करने की चर्चाएं कई कानूनी और राजनीतिक सवालों को जन्म दे रही हैं। इस पूरे मामले को लेकर आरटीआई कार्यकर्ता अब्दुल सुल्तान ने जिला कलेक्टर से शिकायत भी की है।
कोर्ट के आदेश और पर्यावरणीय पेंच
दरअसल, 2023 में अब्दुल सुल्तान बनाम राज्य शासन (WPC 615/2023) मामले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि यदि भविष्य में इस योजना को अमलीजामा पहनाया जाता है तो CPCB और NGT के दिशा-निर्देशों का पालन अनिवार्य होगा।
याचिका में तर्क दिया गया था कि सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट से 200–500 मीटर की दूरी तक किसी भी परियोजना की अनुमति नहीं दी जा सकती। यह एरिया पहले से नो कंस्ट्रक्शन ज़ोन में है यहां कोई भी निर्माण करने के लिए टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग से अनुमति/विकास अनुज्ञा नहीं मिलती है। बरबसपुर की भूमि उसी यूनिट से लगी हुई है।
अधिकारियों ने भी उठाए थे सवाल
सूत्रों के अनुसार, तत्कालीन कलेक्टर संजीव झा और तत्कालीन नगर निगम आयुक्त प्रभाकर पाण्डेय ने भी इस योजना पर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि बरबसपुर क्षेत्र में इतनी बड़ी शासकीय जमीन उपलब्ध ही नहीं है। इसके बाद भुलसीडीह (झगरहा मेडिकल कॉलेज के पास) में जमीन चिन्हित की गई थी, लेकिन शासन से अनुमति न मिलने के कारण मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
अधिसूचना और विवादित भूमि
बरबसपुर में कुल 72.91 एकड़ भूमि नगर निगम को सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के लिए दी गई थी। लेकिन 18 सितंबर 2020 की अधिसूचना में से 40.36 एकड़ भूमि ट्रांसपोर्ट नगर के लिए अलग कर दी गई।
इसी इलाके से लगी भूमि को सॉलिड वेस्ट प्लांट और मेडिकल वेस्ट डिस्पोजल यूनिट के लिए 30 साल तक आरक्षित किया गया है। पूरे शहर का मेडिकल वेस्ट और कचरा यहीं डिस्पोज किया जाता है। यही कारण है कि योजना पर पर्यावरणीय और कानूनी सवाल खड़े हो रहे हैं।
राजनीतिक रंग भी गहरा
बरबसपुर को लेकर विवाद इस वजह से भी गरमाया कि पूर्व राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल और उनके परिवार/सहयोगियों की जमीनें इस प्रस्तावित क्षेत्र से लगी बताई गईं। आरोप लगे कि विशेष लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए ही बरबसपुर को ट्रांसपोर्ट नगर के लिए चुना गया।
सबसे बड़ा सवाल – कोर्ट या राजनीति ?
अब जबकि सरकार बदलने के साथ ही बरबसपुर को ट्रांसपोर्ट नगर बनाने की कवायद दोबारा शुरू हो रही है, तो बड़ा सवाल यही है—
- क्या यह मामला हाईकोर्ट की अवमानना (Contempt of Court) में बदल जाएगा ?
- या फिर विरोधियों की ओर से नया केस दर्ज कर योजना को दोबारा रोका जाएगा ?
फिलहाल नगर निगम और प्रशासन ने इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन अंदरखाने हलचल तेज है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी नियम-कायदों और अदालत के आदेशों के बीच संतुलन साधते हैं या फिर बरबसपुर की यह कहानी एक बार फिर कोर्ट तक जा पहुंचती है।